हिंदी गंदी कहानी भाग 1: भोपाल की कविता और जिम ट्रेनर आरव
जिम के लॉकर से अपनी पानी की बोतल निकालते हुए कविता की उंगलियां एक मुड़े हुए कागज से टकराईं। कागज छोटा था, कोने से थोड़ा मुड़ा हुआ, और उस पर नीली स्याही से लिखा था, आपकी मुस्कान देखकर वर्कआउट भूल जाता हूं। नीचे कोई नाम नहीं था, पर हैंडराइटिंग कविता पहचान गई थी। वही हैंडराइटिंग जो हर शाम अटेंडेंस रजिस्टर पर दिखती थी, जब आरव नए मेंबर्स के नाम लिखता था। कविता को लगा जैसे किसी हिंदी गंदी कहानी का पहला पन्ना उसके हाथ में आ गया हो।
कविता ने कागज को दोबारा मोड़ा और अपनी जिम बैग की अंदरूनी जेब में रख लिया। दिल तेजी से धड़क रहा था, पर चेहरे पर उसने वही शांत भाव रखा जो क्लास में बच्चों के सामने रखती थी। तीस साल की उम्र, भोपाल के एक स्कूल में टीचर, और पति इंदौर में पोस्टेड। अकेलापन उसके जीवन का स्थायी मेहमान बन चुका था, पर आज पहली बार किसी ने उस अकेलेपन में एक खिड़की खोली थी।
अगली शाम कविता जानबूझकर थोड़ी देर से जिम पहुंची। आरव काउंटर पर खड़ा था, काले टीशर्ट में, बांहों की नसें उभरी हुईं। उसने कविता को देखा तो मुस्कुराया, और वह मुस्कान इतनी साफ थी कि कविता समझ गई कि नोट उसी ने लिखा था। उसने बैग से कागज निकालकर काउंटर पर रख दिया और धीरे से कहा, यह क्या है आरव।
आरव ने कागज देखा, फिर कविता की आंखों में देखा। उसके चेहरे पर न शर्म थी, न डर। उसने कहा, जो सच है वही लिखा है मैडम। आप जब ट्रेडमिल पर चलती हैं तो पूरा जिम रुककर आपको देखता है, मैं भी उन्हीं में से एक हूं। कविता हंस पड़ी, पर हंसी के पीछे एक अजीब सी गर्मी दौड़ गई। उसने कहा, टीचर को इस तरह नोट लिखते हो, शर्म नहीं आती। आरव ने जवाब दिया, शर्म तो तब आती जब झूठ लिखता।
उस दिन के बाद दोनों के बीच एक खेल शुरू हो गया। आरव कविता का पर्सनल ट्रेनर बन गया, कम से कम कागज पर। वह उसके पीछे खड़ा होकर स्क्वाट्स के दौरान उसकी कमर पर हाथ रखता, पोश्चर ठीक करने के बहाने उसकी पीठ को छूता। कविता जानती थी कि यह पोश्चर ठीक करना नहीं है, और आरव जानता था कि कविता जानती है। फिर भी दोनों इस नाटक को जारी रखे हुए थे, क्योंकि नाटक के बिना सच बोलना बहुत खतरनाक होता।
एक शाम जिम में भीड़ कम थी। बारिश की हल्की फुहार बाहर पड़ रही थी और खिड़कियों पर बूंदें टपक रही थीं। आरव ने कविता से कहा, आज स्ट्रेचिंग वाले कमरे में चलते हैं, वहां शांति मिलेगी। स्ट्रेचिंग वाला कमरा पीछे था, जहां मैट बिछे थे और दरवाजा आधा बंद हो जाता था। कविता ने अपनी बॉटल उठाई और उसके पीछे चल दी।
कमरे में पहुंचते ही आरव ने दरवाजा धीरे से बंद कर दिया। वह कविता के सामने खड़ा हुआ और बोला, मैडम, आज एक नया एक्सरसाइज सिखाता हूं। उसने कविता के कंधों पर हाथ रखे और उसे दीवार की तरफ घुमाया। कविता की सांस तेज हो गई। उसने कहा, आरव, यह क्या कर रहे हो। आरव ने उसके कान के पास फुसफुसाकर कहा, वही जो आप पिछले एक हफ्ते से चाह रही हैं।
कविता ने पलटकर आरव की आंखों में देखा। उसकी आंखों में वह प्यास थी जो महीनों से उसके अंदर सोई हुई थी। उसने आरव की टीशर्ट का कॉलर पकड़ा और उसे अपनी तरफ खींच लिया। दोनों के होंठ मिले, पहले धीरे, फिर बेतहाशा। आरव ने कविता की कमर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और उसे दीवार से सटा दिया। कविता ने उसके बालों में उंगलियां फंसा लीं और उसकी गर्दन पर अपने होंठ रख दिए।
आरव के हाथ अब कविता की जिम टीशर्ट के नीचे सरक रहे थे। उसकी उंगलियां उसकी नंगी कमर पर घूम रही थीं, और कविता के शरीर में एक करंट दौड़ रहा था। उसने आरव की टीशर्ट ऊपर उठाई और उसकी छाती पर अपने हाथ फिराए। आरव की छाती पसीने से चमक रही थी, और कविता ने उस पर अपने होंठ रख दिए। आरव ने एक गहरी सांस ली और कहा, मैडम, आप तो आग हैं।
कविता हंसकर बोली, आग को हाथ लगाने वाले जलते भी हैं। आरव ने उसकी टीशर्ट ऊपर उठा दी और उसके स्पोर्ट्स ब्रा के ऊपर से ही उसके बूब्स को दबाने लगा। कविता ने सिर पीछे टिका दिया और आंखें बंद कर लीं। उसके मुंह से एक हल्की सी आह निकली, जो कमरे की खामोशी में गूंज गई। आरव ने ब्रा को ऊपर सरका दिया और उसके निप्पल पर अपनी जीभ फिराई।
कविता का शरीर कांपने लगा। उसने आरव के शॉर्ट्स के ऊपर से ही उसके लंड को महसूस किया, जो पूरी तरह तन चुका था। उसने हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ लिया और धीरे धीरे दबाने लगी। आरव ने कहा, मैडम, धीरे कीजिए, वरना अभी ही सब खत्म हो जाएगा। कविता ने शरारत से कहा, तो होने दो, फिर से शुरू करेंगे।
आरव ने कविता की लेगिंग नीचे सरकाई। उसकी चूत गीली हो चुकी थी, और पैंटी पर गीलापन साफ दिख रहा था। आरव ने पैंटी को एक तरफ सरकाया और अपनी उंगलियों से उसकी चूत को सहलाने लगा। कविता ने दीवार को कसकर पकड़ लिया। उसकी टांगें कांप रही थीं, और उसके मुंह से लगातार सिसकियां निकल रही थीं।
आरव ने घुटनों पर बैठकर कविता की चूत को चाटना शुरू किया। उसकी जीभ हर बार एक नई जगह छूती, और कविता का शरीर हर बार एक नई लहर से भर जाता। कविता ने उसके सिर को अपने हाथों से दबा लिया और कहा, बस, ऐसे ही, रुकना मत। कुछ ही मिनटों में कविता का शरीर अकड़ गया और वह जोर से झड़ गई। उसका पानी आरव के चेहरे पर लग गया, और आरव ने मुस्कुराकर उसे पोंछ लिया।
कविता अभी सांस ले ही रही थी कि आरव खड़ा हुआ और उसने अपने शॉर्ट्स उतार दिए। उसका लंड लंबा और मोटा था, और कविता ने उसे देखते ही अपने होंठ गीले कर लिए। उसने घुटनों पर बैठकर आरव का लंड अपने मुंह में ले लिया। पहले धीरे, फिर तेज, उसकी जीभ लंड के चारों ओर घूम रही थी। आरव ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, मैडम, आप तो कमाल हैं।
कुछ देर बाद आरव ने कविता को उठाया और मैट पर लिटा दिया। उसने उसकी टांगें फैलाईं और अपना लंड उसकी चूत के मुंह पर रखा। कविता ने कहा, धीरे से डालना, बहुत दिनों बाद है। आरव ने धीरे से धक्का दिया और उसका लंड अंदर सरक गया। कविता ने एक लंबी आह भरी, जिसमें दर्द और मजा दोनों थे।
आरव ने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किए। हर धक्के के साथ कविता की चूत उसे और अंदर खींच रही थी। कविता ने अपनी टांगें उसकी कमर पर लपेट लीं और उसके हर धक्के का जवाब अपनी कमर उठाकर देने लगी। कमरे में सिर्फ दोनों की सांसों और मैट की आवाज गूंज रही थी। बाहर बारिश तेज हो गई थी, पर अंदर की गर्मी उससे कहीं ज्यादा थी।
आरव ने कविता को पलटकर घोड़ी बनाया। उसने पीछे से उसकी चूत में लंड डाला और उसके बूब्स को दोनों हाथों से पकड़ लिया। इस पोजीशन में हर धक्का और गहरा लग रहा था। कविता ने मैट को कसकर पकड़ लिया और चिल्लाकर कहा, और तेज, आरव, और तेज। आरव ने अपनी रफ्तार बढ़ा दी और कविता का शरीर फिर से अकड़ने लगा।
दूसरी बार झड़ते हुए कविता ने जोर से आरव का नाम लिया। उसकी चूत ने आरव के लंड को कसकर जकड़ लिया, और आरव भी ज्यादा देर नहीं टिक पाया। उसने अपना लंड बाहर निकाला और कविता की पीठ पर झड़ गया। दोनों हांफते हुए मैट पर लेट गए, पसीने में भीगे हुए, एक दूसरे की बाहों में।
कुछ देर खामोशी रही। फिर कविता ने कहा, यह गलत है आरव, मैं शादीशुदा हूं। आरव ने उसकी ओर देखा और कहा, गलत तो वह है जो आप हर रात अकेले रोती हैं। यहां जो हुआ, वह सच था। कविता कुछ नहीं बोली। वह जानती थी कि आरव सच कह रहा है, और यही बात उसे सबसे ज्यादा डरा रही थी।
दोनों ने कपड़े ठीक किए और कमरे से बाहर निकले। जिम लगभग खाली हो चुका था। कविता ने बैग उठाया और दरवाजे की तरफ बढ़ी। आरव ने पीछे से कहा, मैडम, कल फिर आइएगा, नया एक्सरसाइज सिखाना है। कविता ने बिना पलटे मुस्कुराकर कहा, देखेंगे।
घर पहुंचकर कविता ने दरवाजा बंद किया और शीशे के सामने खड़ी हो गई। उसकी गर्दन पर आरव के होंठों का निशान था, हल्का सा लाल। उसने उसे छुआ और एक अजीब सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई। वह बिस्तर पर लेट गई, पर नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी। हर बार आंखें बंद करते ही आरव का चेहरा सामने आ जाता।
अगले कुछ दिनों में दोनों के बीच यह सिलसिला और गहरा हो गया। कभी जिम के स्टोर रूम में, कभी कविता के फ्लैट में जब सोसाइटी के लोग अपने काम पर होते। आरव हर बार एक नई जगह, एक नई अदा के साथ आता। कभी वह कविता को किचन स्लैब पर बिठाकर चोदता, कभी बालकनी में खड़े होकर पीछे से। कविता ने खुद को पूरी तरह इस रिश्ते में डुबो दिया था, और डूबते हुए उसे डर भी लग रहा था और मजा भी आ रहा था।
एक शाम कविता के फ्लैट में दोनों बेडरूम में थे। आरव ने कविता की साड़ी उतारी और उसे बिस्तर पर लिटा दिया। उसने उसके पूरे शरीर को चूमा, गर्दन से लेकर पैरों तक। फिर उसने कविता की चूत को अपनी जीभ से चाटा, तब तक जब तक कविता झड़ नहीं गई। उसके बाद उसने कविता को अपने ऊपर बिठाया। कविता ने उसका लंड अपनी चूत में डाला और ऊपर नीचे होने लगी। उसके बूब्स हर उछाल के साथ हिल रहे थे, और आरव ने उन्हें अपने हाथों में भर लिया।
कविता जब झड़ी तो उसने आरव को कसकर गले लगा लिया। आरव ने उसे पलटकर नीचे लिटाया और मिशनरी में तेज धक्के लगाने लगा। दोनों का पसीना एक हो गया था, और बिस्तर की चादर सलवटों में बदल गई थी। आखिर में आरव ने अपना पानी कविता की चूत के अंदर ही छोड़ दिया। कविता ने उसकी पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए और कहा, तुमने तो मुझे पागल कर दिया है।
उस रात आरव के जाने के बाद कविता बालकनी में खड़ी थी। भोपाल की रात की हवा ठंडी थी, पर उसके अंदर अभी भी गर्मी थी। तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर पति का नाम चमक रहा था। कविता ने फोन उठाया और उधर से आवाज आई, कविता, एक खुशखबरी है, मैं कल सुबह पहुंच रहा हूं, सरप्राइज।
कविता का दिल एक पल के लिए रुक सा गया। कल सुबह, यानी अब से कुछ ही घंटों बाद। और आरव कल सुबह जिम में उसका इंतजार करेगा, जैसा कि उसने वादा किया था। फोन हाथ से छूटते छूटते बचा। कविता ने धीरे से कहा, अच्छा, कब की ट्रेन है। पर उसके दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था कि कल सुबह जब पति दरवाजे पर होगा, तो आरव का मैसेज भी उसी वक्त आएगा, और तब क्या होगा।
अगला भाग जल्द आ रहा है।
रविवार की सुबह जिम खाली था। कविता ने जानबूझकर सबसे पहले आने का समय चुना था, जब सिर्फ आरव होता है और शटर आधा खुला होता है। आरव ने उसे देखते ही मुस्कुराकर कहा, मैडम, आज योगा कराते हैं, सिर्फ आप और मैं।
कविता मैट पर बैठ गई और आरव उसके पीछे आकर बैठ गया। उसने कविता की पीठ पर हाथ रखे और धीरे से कहा, सांस अंदर, सांस बाहर। पर उसके हाथ पीठ से नीचे सरक रहे थे, और कविता की सांसें खुद ही तेज हो रही थीं। उसने कहा, यह कैसा योगा है आरव। आरव ने उसके कान में कहा, यह वाला सिर्फ हमारे लिए है।
आरव ने कविता को अपनी तरफ घुमाया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। सुबह की रोशनी खिड़की से आ रही थी और दोनों की परछाइयां मैट पर एक हो रही थीं। आरव ने कविता की कुर्ती के बटन एक एक करके खोले। हर बटन के साथ कविता की धड़कन तेज होती गई।
उसने कविता के बूब्स को अपने मुंह में लिया और धीरे धीरे चूसने लगा। कविता ने उसके बाल पकड़ लिए और कहा, धीरे मत करो, आज जल्दी है। आरव ने मुस्कुराकर उसकी सलवार का नाड़ा खोला और अपनी उंगलियों से उसकी चूत को सहलाया। कविता गीली हो चुकी थी, और उसकी सिसकियां पूरे खाली जिम में गूंज रही थीं।
आरव ने उसे मैट पर लिटाया और अपने लंड को उसकी चूत में धीरे से डाला। सुबह की ठंडक और दोनों के शरीर की गर्मी का फर्क इतना था कि हर धक्का एक नई आग लगा रहा था। कविता ने अपनी टांगें उसकी कमर पर कस लीं और हर धक्के के साथ अपनी कमर उठाने लगी।
कुछ ही मिनटों में कविता झड़ गई, और उसके बाद आरव भी उसके अंदर ही झड़ गया। दोनों मैट पर लेटे रहे, खिड़की से आती धूप उनके चेहरों पर पड़ रही थी। कविता ने कहा, यह योगा तो रोज होना चाहिए। आरव हंसकर बोला, रोज होगा मैडम, आप बस आती रहिए।
हिंदी गंदी कहानी भाग 2: कविता और आरव का खतरनाक खेल
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