नर्स की चुदाई की कहानी: ममता की नाइट शिफ्ट

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दवाइयों वाले कमरे का दरवाज़ा ठीक उसी वक्त खुला जब ममता ऊपर की शेल्फ से पट्टी का डिब्बा उतार रही थी। यह नर्स की चुदाई की कहानी उसी आधी रात से शुरू होती है, जब जयपुर के एक प्राइवेट अस्पताल की नाइट शिफ्ट में एक अजनबी ने उसे सबसे गलत वक्त पर सबसे सही जगह पर आकर रोक लिया था।

"सॉरी," अरनव ने कहा, दरवाज़े पर खड़ा। "मैंने सोचा कोई है नहीं। पापा के लिए पानी की बोतल चाहिए थी, वॉर्ड बॉय दिख नहीं रहा।"

ममता छब्बीस साल की थी, स्टाफ नर्स, और पिछले तीन साल से नाइट ड्यूटी उसकी ज़िंदगी बन चुकी थी। उसने डिब्बा नीचे रखा और उसे देखा। इकतीस के आसपास, बिना शेव की हल्की दाढ़ी, आंखों में तीन रातों की नींद की कमी, और फिर भी एक ऐसी मुस्कान जो थकान में भी चमकती थी।

"बोतलें नीचे कैंटीन से मिलती हैं, पेशेंट के अटेंडेंट को यहां आने की इजाज़त नहीं है," उसने कहा, मगर उसकी आवाज़ में वो सख्ती नहीं थी जो होनी चाहिए थी।

"तो मुझे सज़ा दीजिए, सिस्टर," अरनव ने कहा, और उसके होंठों के कोने में जो शरारत थी, उसने ममता के पेट में कुछ हिला दिया। "वैसे मेरा नाम अरनव है। और आप रात में यहां अकेली ड्यूटी करती हैं?"

"ममता," उसने कहा, और फिर खुद पर हैरान हुई कि उसने अपना नाम क्यों बताया। "और हां, अकेली। अब जाइए, मुझे काम है।"

वह चला गया, मगर उसके जाने के बाद दवाइयों के कमरे की हवा में उसकी खुशबू रह गई। ममता ने गहरी सांस ली और काम में लग गई, मगर उसका ध्यान बार बार दरवाज़े की तरफ जाता रहा।

तीन रातों से यह सिलसिला चल रहा था। अरनव के पिता बाईपास सर्जरी के बाद आईसीयू से वॉर्ड में शिफ्ट हुए थे। और अरनव हर रात नर्सेज़ स्टेशन के चक्कर लगाता था। कभी चाय मांगने, कभी रिपोर्ट के बारे में पूछने, कभी बस ऐसे ही। ममता समझती थी। वह नादान नहीं थी।

रात के दो बजे वॉर्ड में सन्नाटा था। ममता ने राउंड लिया, सब मरीज़ सो रहे थे। वह नर्सेज़ स्टेशन पर बैठी रजिस्टर में एंट्री कर रही थी, तभी सामने की कुर्सी पर कोई बैठा।

"आप सोती कब हैं?" अरनव ने पूछा। उसके हाथ में दो कागज़ के कप थे। "चाय। कैंटीन वाला सो रहा था, मैंने खुद बनाई है। बुरी बनी हो तो माफ कर दीजिएगा।"

ममता ने कप लिया। चाय मीठी थी, तेज़ थी, और रात के उस पहर में जन्नत लग रही थी। "तुम्हारे पापा कैसे हैं?" उसने पूछा।

"सो रहे हैं। डॉक्टर ने कहा सब ठीक है।" अरनव ने उसे देखा। "और तुम? तुम्हारी आंखें बता रही हैं कि तुम तीन साल से ठीक से सोई नहीं हो।"

"नाइट शिफ्ट वालों की आंखें ऐसी ही होती हैं," ममता ने हंसकर कहा, मगर उसकी हंसी में थकान थी।

वह दोनों चाय पीते रहे। बातें अस्पताल से हटकर ज़िंदगी पर आ गईं। अरनव ने बताया कि वह बिज़नेस करता है, शादी नहीं हुई, मां नहीं रहीं। ममता ने बताया कि वह छोटे शहर से है, मां बाप गांव में, और यह नौकरी उसके लिए सब कुछ है।

"तुम बहुत मज़बूत हो," अरनव ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई थी। उसने मेज़ पर रखा ममता का हाथ छू लिया। बस एक हल्का सा छुअन।

ममता ने हाथ नहीं हटाया। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। "अरनव," उसने कहा, "यह ठीक नहीं है।"

"मुझे पता है," उसने कहा, मगर उसका हाथ वहीं रहा, और उसका अंगूठा उसकी कलाई पर धीरे धीरे घूमने लगा। "फिर भी।"

तभी वॉर्ड से बेल बजी। बेड नंबर चार। ममता झटके से उठी, और वह लम्हा टूट गया। मगर जाते जाते उसने पलटकर देखा, और अरनव उसे ही देख रहा था।

रात के तीन बजे ममता दवाइयों के कमरे में स्टॉक मिला रही थी। दरवाज़ा खुला था, वॉर्ड की तरफ। तभी उसे अपने पीछे किसी की सांस महसूस हुई। वह पलटी। अरनव था। उसने धीरे से दरवाज़ा बंद कर दिया।

"कोई देख लेगा," ममता ने फुसफुसाकर कहा, उसकी धड़कन कानों में बज रही थी।

"तो देखने दो," अरनव ने कहा, और उसे दीवार से लगा लिया। उसके होंठ ममता के होंठों पर थे, इससे पहले कि वह कुछ सोच पाती।

यह कोई पहला चुम्बन नहीं था, यह तीन रातों की नज़रों का हिसाब था। अरनव के हाथ ममता की कमर पर थे, उसे अपने से चिपकाए हुए। ममता ने उसकी शर्ट को मुट्ठियों में भींच लिया। उसके होंठों से एक सिसकी निकली जो उसके गले में ही दब गई।

अरनव का हाथ उसकी नर्स की यूनिफॉर्म के बटनों पर आया। उसने उन्हें एक एक करके खोला, जल्दी में, मगर नरमी से। जब यूनिफॉर्म खुली, तो उसने उसे कंधों से सरका दिया। नीचे सफेद बनियान थी।

उसने बनियान भी ऊपर कर दी, और ममता के दूध को ब्रा के ऊपर से ही अपने हाथों में ले लिया। उसने उन्हें दबाया, मला, और ममता की कमर धनुष की तरह तन गई। "अरनव," वह हांफी, "जल्दी करो, कोई आ जाएगा।"

अरनव ने उसकी ब्रा का हुक खोल दिया। उसके दूध आज़ाद हो गए, और अरनव ने एक निप्पल को मुंह में ले लिया। उसने उसे चूसा, काटा हल्के से, और ममता ने अपना मुंह उसके कंधे में दबा लिया ताकि आवाज़ न निकले।

उसका हाथ नीचे गया, उसकी सलवार का नाड़ा खोला, और उसकी उंगलियां उसकी चूत पर पहुंच गईं। वह गीली थी, बहुत गीली। अरनव ने एक उंगली अंदर डाली, फिर दूसरी, और ममता की टांगें कांपने लगीं।

"इतनी गीली," उसने उसके कान में फुसफुसाया। "तीन रातों से यही हाल है क्या?"

ममता ने जवाब में उसकी पैंट की ज़िप खोली। उसका लंड बाहर निकला, लंबा और सख्त। उसने उसे अपने हाथ में लिया और हिलाने लगी। अरनव ने दीवार पर हाथ टिका दिए।

"ममता," वह हांफा। "मुझे तुम्हारे अंदर आना है। अभी।"

उसने उसे घुमाया, उसका चेहरा दवाइयों की शेल्फ की तरफ। उसने उसकी सलवार नीचे खींची, अपना लंड उसकी चूत के मुंह पर रखा, और एक ही धक्के में पूरा अंदर कर दिया।

ममता ने अपनी चीख को अपने हाथ से दबाया। वह इतना अंदर था, इतना भरा हुआ। अरनव ने उसे शेल्फ से लगाए रखा और धक्के लगाने लगा। तेज़, गहरे, बेरहम। शेल्फ पर रखी शीशियां हिलने लगीं।

"धीरे," ममता ने फुसफुसाया, "शीशियां गिर जाएंगी।" मगर अरनव रुकने वाला नहीं था। उसने ममता के दूध को पीछे से अपने हाथों में लिया और उन्हें दबाते हुए उसे चोदता रहा।

ममता का शरीर अकड़ने लगा। "मैं झड़ने वाली हूं," वह हांफी। "अरनव, मैं..."

"झड़ जाओ," उसने कहा। "मेरे लंड पर झड़ जाओ।"

और वह झड़ गई। उसकी चूत ने उसके लंड को भींच लिया, उसका पूरा जिस्म कांपा, और उसकी दबी हुई चीख दवाइयों के कमरे की दीवारों में समा गई। उसके झड़ते ही अरनव भी झड़ गया, उसका गर्म पानी उसके अंदर बहता हुआ।

वह दोनों वहीं खड़े रहे, हांफते हुए, एक दूसरे से चिपके। फिर जल्दी जल्दी कपड़े ठीक किए। अरनव ने दरवाज़ा खोला, बाहर झांका, और इशारा किया। ममता बाहर निकली, यूनिफॉर्म ठीक करते हुए, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

मगर कुछ हुआ था। और दोनों जानते थे कि यह सिर्फ शुरुआत थी।

रात के चार बजे वॉर्ड में फिर सन्नाटा था। ममता ने देखा कि अरनव अपने पिता के बेड के पास बैठा है, मगर उसकी नज़रें उस पर थीं। उसने इशारे से उसे स्टोर रूम की तरफ बुलाया।

स्टोर रूम में पुराने बिस्तर और कंबल रखे थे। ममता अंदर आई तो अरनव ने दरवाज़ा बंद किया और उसे अपनी बाहों में ले लिया। इस बार कोई जल्दी नहीं थी, कोई डर नहीं था। बस भूख थी।

उसने ममता को कंबलों के ढेर पर लिटा दिया। उसने उसकी यूनिफॉर्म उतारी, एक एक बटन खोलते हुए, इस बार धीरे धीरे। फिर वह उसके ऊपर झुका और उसके पूरे जिस्म को चूमने लगा। गर्दन से शुरू करके, दूध पर रुकते हुए, पेट पर, और नीचे।

उसने उसकी टांगें फैलाईं और अपनी जीभ उसकी चूत पर रख दी। ममता की कमर उछल गई। वह उसे चाटता रहा, चूसता रहा, उसकी जीभ अंदर बाहर होती रही, और ममता की उंगलियां उसके बालों में गड़ी रहीं।

"अरनव," वह बुदबुदाई, "तुम यह कहां से सीखे हो?"

उसने जवाब में उसकी चूत को और ज़ोर से चूसा, और ममता पहली बार झड़ गई, उसकी जीभ पर, कांपते हुए, सिसकते हुए।

फिर वह उसके ऊपर आया। उसने अपना लंड उसकी चूत में डाला, धीरे धीरे, पूरा, और उसे चोदने लगा। इस बार लय धीमी थी, गहरी थी। हर धक्के के साथ वह उसके अंदर घूमता, और ममता को लगता जैसे वह उसके जिस्म के हर कोने को छू रहा हो।

उसने ममता की टांगें अपने कंधों पर रख लीं। इस पोज़ीशन में वह और गहराई तक जाता था। ममता के दूध हिल रहे थे, और अरनव ने झुककर एक निप्पल को मुंह में ले लिया, चोदते हुए, चूसते हुए।

"और ज़ोर से," ममता ने कहा। "अरनव, और ज़ोर से चोदो मुझे।"

उसने उसकी बात मानी। स्टोर रूम में कंबल बिखर गए। उनकी सांसें, उनकी आहें, उनकी खाल की आवाज़, सब एक हो गए। ममता दूसरी बार झड़ी, और इस बार उसने अरनव का नाम चिल्लाया, बिना डरे, बिना दबाए।

अरनव ने उसे पलटा। उसने उसे घोड़ी बनाया और पीछे से उसमें घुस गया। उसके धक्के अब बेकाबू थे। उसने ममता के बाल पकड़े, हल्के से खींचे, और उसे चोदता रहा।

ममता को इस पोज़ में सबसे ज़्यादा मज़ा आता था। हर धक्का उसकी गहराइयों को छूता था। "हां," वह हांफी, "ऐसे ही, ऐसे ही।"

और फिर वह दोनों एक साथ झड़े। ममता की चीख और अरनव की गुर्राहट एक हो गई। वह उस पर गिर पड़ा, दोनों पसीने में भीगे, कंबलों में लिपटे।

"तुम्हारी शिफ्ट कब खत्म होती है?" अरनव ने पूछा, उसकी उंगलियां उसके बालों में थीं।

"सुबह आठ बजे," ममता ने कहा। "फिर मैं घर जाऊंगी, सोऊंगी, और शाम को फिर आऊंगी।"

"और मैं?" अरनव ने पूछा। "मैं कहां जाऊंगा?"

ममता मुस्कुराई। "तुम्हारे पापा को अभी दो दिन और रहना है।" उसने उसके होंठों पर उंगली रखी। "दो रातें और।"

सुबह के छह बजे, जब पहली शिफ्ट की नर्सें आने लगीं, ममता नर्सेज़ स्टेशन पर थी, बिल्कुल तरोताज़ा, जैसे रात भर कुछ हुआ ही न हो। अरनव अपने पिता के पास बैठा था, अखबार पढ़ने का नाटक करते हुए।

ममता उसके पास से गुज़री, दवा का चार्ट लेकर। उसने चार्ट उसके हाथ में दिया, और चार्ट के नीचे एक मुड़ा हुआ पर्चा था। अरनव ने उसे खोला। उस पर एक नंबर लिखा था, और नीचे: "कल रात। वही जगह। पहले आना।"

अरनव ने पर्चा जेब में रखा और ममता को देखा। उसने पलक झपकाई, बस एक बार। और अपने काम में लग गई, उसके होंठों पर एक ऐसी मुस्कान थी जो सुबह की रोशनी में भी छिपती नहीं थी।

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