हिंदी गांव की सेक्स कहानी: नए मास्टर के साथ कुएं वाली जवान रात
"मास्टर जी, बाल्टी तो रोज भर जाती है, पर कुएं पर आना अभी भी खाली जाता है क्या?" सुनीता की आवाज दोपहर की धूप में लिपटे कुएं के पटिए पर तैर गई, और उसी पल से ये हिंदी गांव की सेक्स कहानी एक नई करवट लेने वाली थी।
अरविंद ने घड़ा पटिए से नीचे झुकाया और मुस्कान छिपाने की नाकाम कोशिश की। "सुनीता भाभी, कुएं पर तो पानी लेने आता हूं, कोई मेला देखने थोड़े ही।" उसकी नजरें पटिए पर रखी उसकी लाल ओढ़नी से फिसल कर उसके चेहरे पर आ टिकीं।
"मेला तो तब लगेगा जब तुम्हारी नजरें नीचे की तरफ देखना सीखेंगी।" सुनीता ने घड़े की डोरी को जानबूझ कर धीमा खींचा ताकि अरविंद को वहां रुकना पड़े। उसकी छाती का लाल ब्लाउज धूप में चमक रहा था और आंचल का सिरा हवा में लहरा रहा था।
अरविंद का गला सूख गया। गांव के इस नए स्कूल में पढ़ाने आए उसे सिर्फ तीन हफ्ते हुए थे और सुनीता के आंगन से लगा कमरा किराए पर लेने के बाद से उसकी हर दोपहर कुएं के इसी रास्ते से गुजरती थी।
"भाभी, गांव वालों को पता चला तो मेरी मास्टरी छूट जाएगी।" अरविंद ने फुसफुसाते हुए कहा, पर उसके कदम कुएं से दूर जाने की जगह एक कदम पास आ गए।
"गांव वालों को तो वो भी पता नहीं कि तुम्हारी बाल्टी मैंने कल उधार ली थी।" सुनीता ने आंख मारी और घड़ा उठा कर कमर पर रख लिया। "दोपहर को आ जाना, बाल्टी लौटाने के बहाने। आंगन का दरवाजा खुला रहेगा।"
अरविंद की सांसें तेज हो गईं। उसने कुएं का ठंडा पानी अपने चेहरे पर छिड़का ताकि अंदर उठती आग को बुझा सके, पर वो आग बुझने वाली नहीं थी।
दोपहर का सूरज जब आंगन की दीवार से आधा उतर चुका था, तब अरविंद हाथ में खाली बाल्टी लेकर सुनीता के आंगन में दाखिल हुआ। सुनीता आंगन के बीचों बीच बैठी सरसों के बीज छांट रही थी।
"आ गए मास्टर जी?" सुनीता ने ऊपर देखा और बाल्टी की तरफ इशारा किया। "रख दो कोने में। और हां, दरवाजा बंद करके आना। कुत्ते घुस आते हैं।"
अरविंद ने दरवाजे की तरफ हाथ बढ़ाया और उसकी कुंडी अंदर से लगा दी। कुंडी की आवाज खट से गूंजी और उसी पल सुनीता की हंसी आंगन में फैल गई।
"अब बोलो, बाल्टी लौटाने आए थे या कुछ और लेने?" सुनीता खड़ी हुई और अपनी ओढ़नी को एक झटके में कंधे से सरका दिया। लाल ब्लाउज के नीचे उसकी भरी छातियां साफ झलक रही थीं।
अरविंद के हाथ से बाल्टी छूट कर टिन की आवाज के साथ गिरी। "सुनीता भाभी, अगर तुम्हारे पति आ गए तो?" उसकी आवाज कांप रही थी।
"मेरा पति डेयरी पर है। शाम को सात बजे से पहले नहीं आता।" सुनीता उसके इतने पास आ गई कि उसकी सांसें अरविंद के सीने पर महसूस हो रही थीं। "और वैसे भी, इस घर में आज फैसले मैं ले रही हूं।"
उसने अरविंद की कमीज़ के बटन एक एक करके खोले। अरविंद ने विरोध करने की कोशिश की, पर उसके हाथ सुनीता की कमर पर ठहर गए।
"शर्माओ मत, मास्टर जी। कुएं पर तो बड़ी हिम्मत दिखाते हो।" सुनीता ने उसकी कमीज़ को कंधों से खींच कर नीचे गिरा दिया और उसके नंगे सीने पर अपनी हथेलियां फेरने लगी।
अरविंद ने पहली बार उसकी कमर को कस कर पकड़ा। उसकी उंगलियां उसके ब्लाउज के हुक पर फिसल रही थीं। "भाभी, तुम ये क्या कर रही हो।"
"वो जो तुम तीन हफ्तों से सोच रहे हो।" सुनीता ने ब्लाउज के हुक खुद खोले और ब्लाउज को जमीन पर गिरा दिया। उसके भारी दूधिया उभार अरविंद की आंखों के सामने नंगे हो गए।
अरविंद की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने पहले कभी किसी औरत को इतने करीब से नंगा नहीं देखा था। उसकी नजरें सुनीता के सीने पर जमी रहीं।
"देखते ही रहोगे या छुओगे भी?" सुनीता ने उसका हाथ उठा कर अपने दाएं उभार पर रख दिया। "महसूस करो, मास्टर जी। ये तुम्हारे लिए ही तरस रहे थे।"
अरविंद ने दोनों हाथों से उसके दूध दबाने शुरू किए। उसकी उंगलियां उसके गुलाबी निप्पलों को मसल रही थीं और सुनीता की सांसें तेज होती जा रही थीं।
"अब तुम भी नंगे हो जाओ।" सुनीता ने उसकी पैंट का बटन खोला और जिपर नीचे खींच दिया। उसका कड़ा लंड अंडरवियर से बाहर निकलने को बेताब था।
अरविंद ने पैंट और अंडरवियर एक साथ नीचे सरका दिए। उसका लंबा मोटा लंड हवा में तन कर खड़ा था, नसें उभरी हुई थीं।
सुनीता की आंखों में चमक आ गई। "वाह, मास्टर जी। किताबों के साथ साथ यहां भी खूब पढ़ाई की है।" उसने लंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया और धीरे धीरे ऊपर नीचे करने लगी।
अरविंद के मुंह से गहरी आह निकली। "भाभी, धीरे करो। मैं अभी..." उसकी टांगें कांपने लगीं।
"अभी नहीं। अभी तो शुरुआत है।" सुनीता घुटनों के बल बैठ गई और लंड के टोपे को अपनी जीभ से छुआ। उसने टोपे के चारों ओर जीभ घुमाई और फिर पूरा टोपा मुंह में भर लिया।
अरविंद ने उसके बालों में उंगलियां फंसा लीं। सुनीता का गर्म मुंह उसके लंड को अंदर तक ले रहा था, उसकी जीभ नीचे की नस पर रगड़ खा रही थी।
"भाभी, बहुत अच्छा लग रहा है।" अरविंद की आवाज भर्रा गई। उसने सुनीता के सिर को हल्के से धकेला ताकि लंड और गहरा जाए।
सुनीता ने लंड को गले तक उतार लिया और कुछ पल वहीं रोके रखा। फिर धीरे धीरे बाहर निकाला, लार की एक धार उसके लंड से उसके होठों तक खिंच गई।
"अब मेरी बारी।" सुनीता खड़ी हुई और अपने पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया। पेटीकोट जमीन पर गिर पड़ा और उसकी नंगी जांघें धूप में चमक उठीं।
अरविंद ने उसकी जांघों के बीच देखा। उसकी फूली हुई गीली चूत की फांकें हल्की खुली थीं और अंदर का गुलाबी मांस झलक रहा था।
"छू कर देखो, कितनी गीली है।" सुनीता ने उसकी उंगली पकड़ कर अपनी चूत की दरार पर रख दी। उंगली गीलेपन में फिसल गई।
अरविंद ने दो उंगलियां उसकी चूत में धकेल दीं। अंदर गर्म और कसा हुआ था। सुनीता ने उसकी कलाई पकड़ ली और उंगलियों को अंदर बाहर करने का इशारा किया।
"हां, ऐसे ही। मेरी चूत को चोदो अपनी उंगलियों से।" सुनीता की आवाज में हवस साफ थी। उसकी चूत से चप चप की आवाजें आने लगीं।
अरविंद ने उंगलियों की रफ्तार बढ़ा दी। उसकी दूसरी हथेली उसके दाने पर रगड़ खा रही थी और सुनीता की टांगें कांपने लगीं।
"रुको, रुको।" सुनीता ने उसकी उंगलियां बाहर निकालीं और दीवार की तरफ इशारा किया। "मुझे दीवार से लगा कर चोदो। वैसे जैसे फिल्मों में होता है।"
अरविंद ने उसे दीवार से टिका दिया। सुनीता ने एक टांग उठा कर उसकी कमर पर रख दी, जिससे उसकी चूत पूरी खुल गई।
अरविंद ने अपने लंड के टोपे को उसकी चूत के मुंह पर रखा। गीलापन इतना था कि टोपा फिसल कर अंदर घुस गया।
"आह, मास्टर जी।" सुनीता ने दीवार को पकड़ लिया। अरविंद ने एक जोरदार धक्के में अपना आधा लंड उसकी चूत में उतार दिया।
अरविंद ने कमर को झटका दिया और पूरा लंड उसकी चूत की गहराई तक पहुंच गया। सुनीता के मुंह से लंबी सिसकी निकली जो आंगन की दीवारों से टकरा कर गूंजी।
अरविंद ने धक्कों की रफ्तार बढ़ा दी। हर धक्के में उसका लंड उसकी चूत की दीवारों से रगड़ खा रहा था और सुनीता की चूत से पानी की आवाजें तेज होती जा रही थीं।
"हां, चोदो मुझे। जोर से चोदो।" सुनीता ने अपनी दूसरी टांग भी उसकी कमर पर लपेट ली। अब वो पूरी तरह अरविंद के सहारे हवा में थी।
अरविंद ने उसे दीवार से सटा कर धक्के मारने जारी रखे। पसीना उसकी पीठ से बह रहा था और सुनीता की चूत उसके लंड को निचोड़ रही थी।
"मैं झड़ने वाली हूं, मास्टर जी।" सुनीता की आवाज टूट रही थी। उसकी चूत की मांसपेशियां लंड के चारों ओर कसने लगीं।
अरविंद ने आखिरी तीन गहरे धक्के मारे। सुनीता की चूत से गर्म पानी की धार उसके लंड पर बही और उसके शरीर में झटके आने लगे।
उसके झड़ते ही अरविंद ने लंड बाहर खींच लिया। उसकी चूत से पानी टपक रहा था और उसकी टांगें कांप रही थीं।
"अंदर आओ।" सुनीता ने उसका हाथ पकड़ा और उसे अपने कमरे में खींच लिया। कमरे में चारपाई पर बिस्तर बिछा था।
सुनीता चारपाई पर लेट गई और टांगें फैला दीं। "अब आराम से। बिस्तर पर चोदो मुझे, जैसे पति चोदता है। पर तुम उससे बेहतर चोदोगे।"
अरविंद उसके ऊपर चढ़ गया। उसने लंड को फिर से उसकी गीली चूत के मुंह पर रखा और धीरे धीरे अंदर धकेला।
इस बार चूत पहले से खुली और गीली थी, इसलिए लंड आसानी से जड़ तक उतर गया। सुनीता ने उसकी कमर को अपनी टांगों से जकड़ लिया।
अरविंद ने मिशनरी में धक्के मारने शुरू किए। हर धक्के में उसकी छातियां हिल रही थीं और वो उन्हें अपने हाथों से दबा रहा था।
"मेरे दूध चूसो।" सुनीता ने उसका सिर अपने सीने पर दबा दिया। अरविंद ने उसके निप्पल को मुंह में भर लिया और चूसने लगा।
उसकी जीभ निप्पल के चारों ओर घूम रही थी और नीचे उसका लंड उसकी चूत में गहरे धक्के मार रहा था। सुनीता की सिसकियां कमरे में गूंज रही थीं।
"और तेज, मास्टर जी। मेरी चूत फाड़ दो।" सुनीता ने उसके कूल्हों को पकड़ कर अपनी तरफ खींचा।
"तुम्हारा लंड बहुत मोटा है। मेरी चूत भर गई है।" सुनीता ने उसके होठों को चूम लिया। उसकी जीभ अरविंद के मुंह में घुस गई।
"मैं फिर से झड़ रही हूं।" सुनीता ने उसके बाल खींच लिए। उसकी चूत ने लंड को इतनी जोर से निचोड़ा कि अरविंद की रफ्तार टूट गई।
गर्म पानी की दूसरी धार उसके लंड पर बही। सुनीता का शरीर ऐंठ गया और उसकी आंखें ऊपर की तरफ चढ़ गईं।
अरविंद ने लंड बाहर निकाला और सुनीता को पलट दिया। "अब पीछे से।" उसकी आवाज में पहली बार हुक्म था।
सुनीता घुटनों और कोहनियों के बल हो गई। उसने अपने कूल्हे ऊपर उठा दिए और चूत अरविंद के सामने खोल दी।
अरविंद ने पीछे से लंड उसकी चूत में पेल दिया। इस पोजीशन में लंड और गहरा जा रहा था। उसने उसके कूल्हों को पकड़ कर धक्के मारने शुरू किए।
"हां, ऐसे ही। मेरी चूत मारो।" सुनीता की आवाज में पागलपन था।
अरविंद की रफ्तार अब बेकाबू थी। उसके अंडकोश उसकी चूत से टकरा रहे थे और कमरे में थप थप की आवाज गूंज रही थी।
"मैं झड़ने वाला हूं, भाभी।" अरविंद ने उसके कूल्हों को कस कर पकड़ लिया।
"अंदर ही झड़ो। मेरी चूत में अपना सारा पानी छोड़ दो।" सुनीता ने अपने कूल्हे पीछे की तरफ धकेल दिए।
अरविंद ने आखिरी गहरा धक्का मारा और उसका लंड सुनीता की चूत में फड़कने लगा। गर्म वीर्य की धारें उसकी चूत की गहराई में उतर गईं।
सुनीता ने उसके पानी को अपनी चूत में महसूस किया और एक लंबी आह भरी। "हां, सारा डाल दो। मेरी चूत को भर दो।"
अरविंद उसके ऊपर ही ढह गया। दोनों के शरीर पसीने से तर थे और उनकी सांसें एक दूसरे में घुल रही थीं।
कुछ देर बाद सुनीता उठी और लोटे से पानी ला कर दोनों ने अपने बदन पोंछे। शाम की हल्की लालिमा खिड़की से अंदर आ रही थी।
"सात बजने में अभी एक घंटा है।" सुनीता ने कपड़े पहनते हुए कहा और अरविंद की तरफ देख कर मुस्कुराई।
अरविंद ने जल्दी जल्दी कमीज़ के बटन लगाए। "भाभी, ये जो हुआ..." उसकी आवाज में डर और खुशी दोनों थे।
"जो हुआ, वो हर दोपहर होगा।" सुनीता ने उसकी कमीज़ का कॉलर ठीक किया। "पर एक शर्त है। कुएं पर अब तुम रोज आओगे।"
अरविंद हंस पड़ा। "बाल्टी लौटाने के बहाने?" उसने पूछा।
"नहीं।" सुनीता ने दरवाजे की कुंडी खोली और धीरे से बोली। "अब बहाने की जरूरत नहीं। अगली बार दरवाजा मैं खुद बंद करूंगी।"
एक हफ्ता बीत गया था। उस दोपहर के बाद अरविंद और सुनीता कुएं पर रोज मिलते, पर अब बातें आंखों में होतीं। एक दिन पानी भरते हुए सुनीता ने धीरे से कहा था। "पूर्णिमा की रात, पिछला दरवाजा खुला रहेगा। आधी रात के बाद आना।"
पूर्णिमा की रात चांद आंगन में चांदी बिछा रहा था। अरविंद दबे पांव पिछवाड़े पहुंचा और धक्का देते ही दरवाजा खुल गया। सुनीता चारपाई पर बैठी उसका इंतजार कर रही थी। उसने पतली नाइटी पहनी थी, जिसके नीचे उसका बदन साफ झलक रहा था।
"आ गए?" सुनीता ने हाथ बढ़ा कर उसे अपने पास खींच लिया। "पूरे हफ्ते मैं इसी रात का इंतजार कर रही थी।"
अरविंद ने उसके होठों पर अपने होंठ रख दिए। चांदनी में उसका चेहरा दमक रहा था। उसने नाइटी के ऊपर से ही उसके दूध दबाने शुरू किए।
सुनीता ने नाइटी को ऊपर खींच कर उतार फेंका। चांदनी में उसका नंगा बदन चमक रहा था। "आज पूरी रात हमारी है। पति डेयरी के काम से शहर गया है।"
अरविंद ने उसके दूध को मुंह में भर लिया। उसकी जीभ निप्पलों पर घूम रही थी और सुनीता की उंगलियां उसके बालों में धंस गईं।
"नीचे आओ।" सुनीता ने उसका सिर अपनी जांघों के बीच दबा दिया। अरविंद ने उसकी चूत को चाटना शुरू किया। उसकी जीभ उसके दाने पर रगड़ खा रही थी।
सुनीता की चूत गीली होती जा रही थी। "हां, ऐसे ही चाटो। मेरी चूत को चूसो।" उसकी टांगें अरविंद के सिर के चारों ओर कस गईं।
अरविंद ने दो उंगलियां उसकी चूत में डालीं और जीभ से दाने को रगड़ता रहा। सुनीता का बदन ऐंठने लगा और उसकी चूत से पानी की धार बह निकली।
"अब तुम लेटो।" सुनीता ने अरविंद को चारपाई पर लिटा दिया और उसकी पैंट उतार दी। उसका लंड तन कर खड़ा था।
सुनीता ने लंड को मुंह में भर लिया। चांदनी रात में उसके होठों की हरकत साफ दिख रही थी। वो लंड को गले तक उतार रही थी।
अरविंद की सांसें तेज हो गईं। "भाभी, अब और नहीं।" उसने सुनीता को ऊपर खींचा और अपने ऊपर बिठा लिया।
सुनीता ने लंड को अपनी चूत के मुंह पर रखा और धीरे धीरे बैठ गई। पूरा लंड उसकी चूत में समा गया। उसने कूल्हे हिलाने शुरू किए।
चांदनी में उसके दूध उछल रहे थे। अरविंद ने उन्हें पकड़ लिया और नीचे से धक्के मारने लगा। चारपाई की चरमराहट रात में गूंज रही थी।
"जोर से, मास्टर जी।" सुनीता की रफ्तार बढ़ गई। उसकी चूत लंड को निचोड़ रही थी।
अरविंद ने उसे पलट कर नीचे लिटा दिया और मिशनरी में चोदने लगा। हर धक्के में सुनीता की सिसकी रात को चीर रही थी।
"मैं झड़ रही हूं।" सुनीता ने उसके कंधों को नोच लिया। उसकी चूत से गर्म पानी बहा और अरविंद ने भी अपना सारा पानी उसकी चूत में छोड़ दिया।
दोनों हांफते हुए चांदनी में लेटे रहे। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे। सुनीता ने उसके कान में फुसफुसा कर कहा। "अगली पूर्णिमा तक इंतजार करना। तब इससे भी लंबी रात होगी।"
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