चेकअप करवाने आई भाभी डॉक्टर से चुद गई: Part 2
दरवाजे पर दस्तक हुई तो चेकअप करवाने आई भाभी ऋतु के हाथ कांप गए। कंपाउंडर की आवाज बाहर से आई, डॉक्टर साहब, आपकी पत्नी आ गई हैं, बाहर बैठी हैं। ऋतु की साड़ी अभी उसकी कमर पर ही अटकी थी और ब्लाउज के हुक खुले पड़े थे। अर्जुन ने उंगली होंठों पर रखी और फुसफुसाकर कहा, आवाज मत करना, मैं संभालता हूं।
पिछली शाम की वह गर्मी अभी ऋतु की सांसों में बसी थी। केबिन की बंद हवा में उसके परफ्यूम और अर्जुन की शर्ट की खुशबू मिली हुई थी। अंदर वाले छोटे कमरे के बिस्तर पर दोनों ने अभी अभी एक दूसरे को पूरी तरह पा लिया था। अब अचानक यह दस्तक सब कुछ बिखेरने आई थी। अर्जुन ने जल्दी से अपनी शर्ट के बटन बंद किए और ऋतु को अंदर के कमरे की ओर धकेल दिया।
ऋतु अंदर के कमरे में जाकर अलमारी के पीछे खड़ी हो गई। उसका दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे लग रहा था कि बाहर तक आवाज जाएगी। उसने अपनी साड़ी को कसकर पकड़ लिया और सांस रोककर खड़ी रही। बाहर केबिन का दरवाजा खुला और ऊंची हील की आवाज फर्श पर टकराई। एक औरत की आवाज आई, अर्जुन, तुम अभी तक क्लिनिक में हो, घर पर सब तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।
अर्जुन की आवाज एकदम शांत थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उसने कहा, बस एक मरीज का चेकअप खत्म हुआ है, मैं अभी निकल रहा था। तुम अचानक कैसे आ गईं। पत्नी ने कहा, तुम्हारा फोन नहीं लग रहा था, इसलिए मैं खुद ही आ गई। ऋतु ने अलमारी के पीछे से अपनी आंखें बंद कर लीं। उसकी टांगें कांप रही थीं और पसीना उसकी पीठ पर बह रहा था।
अलमारी के पीछे खड़े खड़े ऋतु को पिछली शाम का हर पल याद आ रहा था। केबिन में अर्जुन ने पहले उसकी पीठ दबाई थी, फिर उसके हाथ उसकी कमर पर सरकते चले गए थे। उसे याद आया कि कैसे वह खुद भी उस बहाव में बह गई थी और उसने अर्जुन को रोका नहीं था। अब वही बहाव उसे डर के किनारे पर खड़ा कर रहा था। उसने अपने होंठ काट लिए ताकि कोई आवाज बाहर न जाए और अलमारी के ठंडे दरवाजे से अपनी पीठ सटा ली।
पत्नी केबिन में ही खड़ी रही। उसने पूछा, मरीज कौन था, अभी तक कोई गया नहीं दिखा। अर्जुन ने हंसकर कहा, पीछे के दरवाजे से चला गया, पीठ दर्द का पुराना मरीज था। ऋतु ने मन ही मन भगवान को धन्यवाद दिया कि क्लिनिक में पीछे का एक छोटा दरवाजा सच में था। पत्नी ने फिर कहा, चलो फिर, घर चलो, खाना ठंडा हो रहा है। अर्जुन ने कहा, तुम गाड़ी में बैठो, मैं कंपाउंडर को हिदायत देकर आता हूं।
बाहर के दरवाजे के बंद होने की आवाज आई और फिर गाड़ी के स्टार्ट होने की आवाज धीरे धीरे दूर हो गई। अर्जुन ने अंदर का दरवाजा खोला तो ऋतु अलमारी के पीछे से बाहर आई। उसकी आंखों में आंसू थे और होंठ कांप रहे थे। उसने कहा, डॉक्टर साहब, अगर वह अंदर आ जाती तो मेरी जिंदगी खत्म हो जाती। अर्जुन ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और कहा, कुछ नहीं हुआ, तुम सुरक्षित हो, और अब कोई नहीं आएगा।
ऋतु ने अपनी साड़ी ठीक करने की कोशिश की तो अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसने कहा, अभी मत जाओ, जो अधूरा रह गया था उसे पूरा कर लेते हैं। ऋतु ने पहले मना करने के लिए मुंह खोला, पर अर्जुन की आंखों में वह गर्मी देखकर उसका मना करना ही भूल गई। खतरे के बाद की यह बेचैनी दोनों के अंदर एक नई आग जगा रही थी। ऋतु ने धीरे से कहा, दरवाजा बंद कर दो, इस बार ताला भी लगा दो।
अर्जुन ने केबिन का दरवाजा अंदर से बंद किया और ताला घुमाया। फिर उसने ऋतु को अपनी बांहों में खींच लिया। उसकी साड़ी का पल्लू फर्श पर सरक गया और ब्लाउज के खुले हुक उसकी छाती को और उभार रहे थे। अर्जुन ने उसके गले पर होंठ रख दिए और धीरे धीरे नीचे की ओर बढ़ने लगा। ऋतु ने उसकी शर्ट को पकड़कर अपनी ओर खींचा और कहा, आज मुझे मत रोको, आज मैं सब कुछ चाहती हूं।
अर्जुन ने ऋतु के ब्लाउज को उसके कंधों से नीचे सरकाया और उसकी चूचियों को अपने हाथों में भर लिया। उसके निप्पल सख्त हो चुके थे और ऋतु की सांसें तेज हो गई थीं। अर्जुन ने एक निप्पल को मुंह में लिया और धीरे धीरे चूसने लगा। ऋतु ने अपना सिर पीछे झुकाया और उसके बालों में उंगलियां फंसा लीं। उसने कहा, हां, ऐसे ही, और जोर से।
ऋतु ने अर्जुन की पैंट का बटन खोला और उसका लंड बाहर निकाल लिया। वह पहले से ही पूरी तरह सख्त था और उसकी नसें उभरी हुई थीं। ऋतु ने उसे अपने हाथ में पकड़कर धीरे धीरे हिलाना शुरू किया। अर्जुन ने आंखें बंद कर लीं और उसके कंधे पर सिर टिका दिया। ऋतु नीचे झुकी और लंड को अपने मुंह में ले लिया। उसकी जीभ लंड के ऊपर घूम रही थी और अर्जुन की सांसें अटक अटक कर चल रही थीं।
कुछ देर बाद अर्जुन ने ऋतु को उठाया और अंदर के कमरे के बिस्तर तक ले गया। उसने ऋतु की साड़ी पूरी तरह खोल दी और उसे बिस्तर पर लिटा दिया। ऋतु की चूत पूरी तरह गीली थी और उसकी जांघों पर पानी की चमक दिख रही थी। अर्जुन ने अपनी उंगलियां उसकी चूत पर रखीं और धीरे धीरे अंदर बाहर करने लगा। ऋतु ने बिस्तर की चादर को मुट्ठियों में भींच लिया और कहा, बस अब मत तड़पाओ, अंदर डाल दो।
अर्जुन ने अपना लंड ऋतु की चूत के मुंह पर रखा और एक ही धक्के में पूरा अंदर डाल दिया। ऋतु की चीख उसके गले में ही अटक गई और उसने अर्जुन की पीठ को अपने नाखूनों से पकड़ लिया। अर्जुन ने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किए और हर धक्के के साथ ऋतु की आहें तेज होती गईं। बिस्तर की चरमराहट और दोनों की सांसों की आवाज उस छोटे कमरे में गूंज रही थी।
ऋतु ने अपनी टांगें अर्जुन की कमर के चारों ओर लपेट लीं और हर धक्के का जवाब अपनी कमर उठाकर देने लगी। अर्जुन ने उसकी चूचियों को मुंह में लिया और चूसते हुए धक्कों की रफ्तार बढ़ा दी। ऋतु का बदन पसीने से भीग गया था और उसकी आंखें बंद थीं। उसने कहा, अर्जुन, मैं झड़ने वाली हूं, रुकना मत। अर्जुन ने कहा, मैं भी बस वहीं हूं, साथ में झड़ते हैं।
दोनों एक साथ झड़े। ऋतु का बदन कांप उठा और उसकी चूत ने अर्जुन के लंड को कसकर जकड़ लिया। अर्जुन ने अपना सारा पानी उसकी चूत के अंदर ही छोड़ दिया और उसके ऊपर ही निढाल होकर गिर पड़ा। कुछ देर तक दोनों ऐसे ही पड़े रहे, एक दूसरे की धड़कनें सुनते हुए। ऋतु ने अर्जुन के बालों में उंगलियां फेरते हुए कहा, आज के बाद मैं डरूंगी नहीं, जो होना है वह होगा।
कुछ मिनट आराम करने के बाद ऋतु ने करवट बदली और अर्जुन के ऊपर आ गई। उसने कहा, अब मेरी बारी है, आप बस लेटे रहो। अर्जुन ने मुस्कुराकर अपने हाथ सिर के पीछे कर लिए। ऋतु ने उसका लंड फिर से अपने हाथ में लिया और धीरे धीरे सहलाने लगी। कुछ ही पलों में वह फिर से सख्त हो गया और ऋतु ने उसे अपनी चूत में खुद ही डाल लिया।
ऋतु ने अपनी कमर को ऊपर नीचे करना शुरू किया। उसकी चूचियां हर उछाल के साथ हिल रही थीं और अर्जुन ने उन्हें अपने हाथों से पकड़ लिया। ऋतु की रफ्तार धीरे धीरे बढ़ती गई और उसके मुंह से लगातार आहें निकलने लगीं। उसने अर्जुन की छाती पर हाथ टिका दिए और अपनी आंखें बंद करके पूरी तरह उस एहसास में डूब गई। अर्जुन ने नीचे से धक्के लगाने शुरू किए तो ऋतु की चीख निकल गई।
इस बार झड़ना धीरे धीरे आया, जैसे लहरें किनारे से टकरा रही हों। ऋतु का बदन कांपने लगा और उसने अर्जुन के कंधों को कसकर पकड़ लिया। अर्जुन ने भी अपनी कमर उठाकर आखिरी धक्के लगाए और दोनों दूसरी बार एक साथ झड़ गए। ऋतु अर्जुन की छाती पर ही ढह गई और दोनों हांफते हुए एक दूसरे को देखने लगे। ऋतु ने कहा, अब मुझे कोई पछतावा नहीं है, यह शाम मेरी जिंदगी की सबसे यादगार शाम है।
थोड़ी देर बाद दोनों उठे और अपने कपड़े पहनने लगे। ऋतु ने शीशे के सामने खड़े होकर अपनी साड़ी ठीक की और बिंदी लगाई। अर्जुन ने पीछे से आकर उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, अगली बार हम किसी होटल में मिलेंगे, जहां कोई दस्तक नहीं होगी, कोई डर नहीं होगा। ऋतु ने शीशे में ही उसकी आंखों में देखा और मुस्कुरा दी। उसने कहा, होटल का कमरा आप बुक करना, साड़ी मैं नई पहनकर आऊंगी।
ऋतु पीछे के दरवाजे से बाहर निकली। जयपुर की रात की हवा उसके चेहरे पर लगी और उसने एक गहरी सांस ली। अब उसके कदमों में डर नहीं था, एक अजीब सी आजादी थी। उसने फोन पर अर्जुन का नंबर देखा और एक मैसेज लिखा, अगली मुलाकात का इंतजार रहेगा, डॉक्टर साहब। फिर उसने फोन जेब में रखा और रिक्शे की ओर बढ़ गई।
अगले हफ्ते की वह शाम ऋतु को अब भी रुला देती है, पर खुशी के आंसुओं से। अर्जुन ने शहर के बाहर एक छोटे होटल में कमरा बुक किया था। ऋतु ने नई साड़ी पहनी थी, वही जिसके बारे में उसने शीशे के सामने वादा किया था। होटल के कमरे में पहुंचते ही अर्जुन ने दरवाजा बंद किया और इस बार सच में ताला लगाया। उसने ऋतु से कहा, आज कोई दस्तक नहीं होगी, आज सिर्फ हम दोनों हैं।
ऋतु ने अपनी साड़ी का पल्लू धीरे से गिराया और अर्जुन की ओर बढ़ी। अर्जुन ने उसे बिस्तर पर बिठाया और उसके पैरों से लेकर गले तक हर जगह चूमा। ऋतु ने अपनी आंखें बंद कर लीं और कहा, डॉक्टर साहब, आज आप मेरा पूरा चेकअप करना, कोई जल्दबाजी नहीं। अर्जुन ने हंसकर कहा, आज का चेकअप लंबा चलेगा, और इस बार कोई कंपाउंडर बीच में नहीं आएगा।
दोनों ने एक दूसरे के कपड़े धीरे धीरे उतारे, जैसे हर बटन एक राज खोल रहा हो। ऋतु की चूचियों पर अर्जुन के हाथ फिरने लगे और उसकी चूत गीली होने लगी। अर्जुन ने उसे बिस्तर पर लिटाया और उसकी टांगें अपने कंधों पर रख लीं। फिर उसने अपना लंड उसकी चूत में डाला और धीरे धीरे धक्के लगाने लगा। ऋतु ने बिस्तर की चादर पकड़ ली और कहा, हां, ऐसे ही, धीरे धीरे, आज मुझे हर पल महसूस करना है।
रात बढ़ती गई और दोनों ने तीन बार एक दूसरे को पाया। हर बार के बाद ऋतु अर्जुन की छाती पर सिर रखकर लेट जाती और कहती, अब यह डर खत्म हो गया है, अब मैं सिर्फ आपकी हूं। सुबह जब ऋतु होटल से निकली तो उसके चेहरे पर एक नई चमक थी। उसने अर्जुन को देखा और कहा, अगली बार फिर यहीं, इसी कमरे में।
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