हिंदी चाची सेक्स कहानी: सुबह वाली स्कूटी सवारी
"रोहन! ब्रेक दबा, ब्रेक! अरे मेरे लाल, दोनों हाथों से पकड़ हैंडल, ऐसे तो तू हमें कीचड़ में पटक देगा!" सुनीता चाची की आवाज़ सुबह की ठंडी हवा में गूँजी और स्कूटी ज़ोर से हिचकोले खाते हुए रुक गई। ये एक सच्ची हिंदी चाची सेक्स कहानी है, उस सुबह की जब खाली मैदान में स्कूटी सिखाने के बहाने दो जिस्मों के बीच की दूरी मिट गई थी।
रोहन के हाथ काँप रहे थे। उसकी छब्बीस साल की उम्र में उसने कभी स्कूटी नहीं चलाई थी, और अब उसकी अड़तीस साल की चाची सुनीता उसके बिल्कुल पीछे बैठी थी, उसके दोनों हाथ उसके हाथों के ऊपर थे। "चाची, डर लग रहा है, कहीं गिर ना जाएँ," रोहन ने हकलाते हुए कहा। सुनीता हँसी, "गिरेंगे तो साथ गिरेंगे, इतना डर किस बात का, मैं हूँ ना तेरे पीछे।"
दिल्ली के बाहरी इलाके का वो मैदान बिल्कुल सुनसान था। सुबह के साढ़े पाँच बजे थे, धुंध हल्की छाई हुई थी और दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे। सुनीता ने जानबूझकर यही वक्त चुना था, कोई देखने वाला नहीं, कोई टोकने वाला नहीं। उसने गुलाबी रंग का सूट पहना था, दुपट्टा गले में लपेटा हुआ, और उसके बालों से शैम्पू की खुशबू आ रही थी।
"अब धीरे से एक्सीलरेटर घुमा, बस इतना सा," सुनीता ने उसके दाएँ हाथ को अपनी उँगलियों से दबाते हुए कहा। उसकी छाती रोहन की पीठ से सट गई। रोहन की साँस अटक गई। चाची के नरम उभार उसकी पीठ पर दब रहे थे और उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा चाची सुन लेंगी।
स्कूटी आगे बढ़ी, थोड़ी टेढ़ी, थोड़ी लड़खड़ाती। "शाबाश! देख, कितना आसान है," सुनीता बोली, लेकिन उसका एक हाथ अब रोहन के हाथ से फिसलकर उसकी जाँघ पर आ टिका था। "चाची, ये हाथ...," रोहन ने कहना चाहा, पर सुनीता ने बीच में ही टोक दिया, "संतुलन के लिए है, बेवकूफ। तू चलाने पर ध्यान दे।"
रोहन का पूरा शरीर गरम हो गया। चाची की हथेली उसकी जाँघ पर थी, और हर हिचकोले पर वो थोड़ा और ऊपर सरक रही थी। उसने सोचा शायद अनजाने में हो रहा है, पर जब स्कूटी एक गड्ढे में उछली और सुनीता का पूरा वज़न उस पर आ पड़ा, तो उसे एहसास हुआ कि ये कोई इत्तेफाक नहीं था। चाची की साँसें उसके कान के पास तेज़ हो रही थीं।
"बस, बस, यहीं रोक दे। पहला राउंड हो गया," सुनीता ने कहा और स्कूटी रुकते ही वो उतर गई। उसने दुपट्टा ठीक किया और मुस्कुराते हुए बोली, "प्रैक्टिस ब्रेक लेते हैं। तू तो पसीने पसीने हो गया है, इतनी ठंड में भी।" रोहन ने नज़रें झुका लीं, "चाची, आपकी वजह से... मेरा मतलब, स्कूटी की वजह से।"
सुनीता ने उसकी ठोड़ी पकड़कर चेहरा ऊपर किया। "मेरी वजह से क्या, बोल ना, रुक क्यों गया?" उसकी आँखों में शरारत थी। रोहन कुछ बोल नहीं पाया। सुनीता ने उसके गाल पर हल्की सी चपत लगाई, "इतना शर्मा मत, जवान लड़के हो, समझती हूँ मैं सब।" उसकी उँगलियाँ उसके गाल पर एक पल ज़्यादा रुकीं।
"अब इस बार मैं आगे बैठती हूँ, तू पीछे से हैंडल पकड़। इससे संतुलन सीखेगा," सुनीता ने कहा और स्कूटी पर आगे बैठ गई। रोहन पीछे बैठा। अब उसका सीना चाची की पीठ से सटा था और उसके हाथ हैंडल तक पहुँचने के लिए उसकी कमर के दोनों ओर से आगे बढ़े थे। सुनीता ने जानबूझकर खुद को थोड़ा पीछे धकेला।
"चाची, आप... आप बहुत पास आ गई हैं," रोहन की आवाज़ फँस गई। सुनीता ने पलटकर देखा, उसके होंठ उसके चेहरे से बस कुछ इंच दूर थे। "तो दूर हट जा, किसने रोका है?" उसने धीरे से कहा। रोहन हटा नहीं। उसकी साँसों में चाची के बालों की खुशबू थी और उसका लंड पैंट में तनने लगा था।
स्कूटी फिर चली। इस बार सुनीता ने ब्रेक अचानक दबाए, रोहन का पूरा शरीर उस पर आ गिरा। "अरे! ये क्या कर रही हो चाची?" वो हड़बड़ाया। सुनीता हँसते हुए बोली, "ब्रेक प्रैक्टिस, बेवकूफ। अचानक ब्रेक लगाना भी सीखना पड़ता है।" पर उसकी कमर पर रोहन के हाथ अब कस गए थे, और हटाने का नाम नहीं ले रहे थे।
तीसरी बार ब्रेक दबाने पर सुनीता ने महसूस किया कि रोहन का तना हुआ लंड उसकी कमर के निचले हिस्से में चुभ रहा है। उसने पलटकर उसकी आँखों में देखा और धीमी आवाज़ में कहा, "ये क्या है, रोहन?" रोहन का चेहरा लाल हो गया, "चाची, वो... अपने आप... सॉरी।" सुनीता ने उसके हाथ को अपनी कमर से हटाया नहीं, बल्कि और कसकर दबा दिया।
"सॉरी किस बात का? जवान हो, ये तो होगा ही," उसने कहा और उसका एक हाथ पीछे ले जाकर रोहन की जाँघ पर रख दिया। इस बार कोई बहाना नहीं था, कोई संतुलन की बात नहीं। उसकी उँगलियाँ सीधे उसकी जाँघ के अंदरूनी हिस्से की ओर बढ़ीं। रोहन की साँस रुक गई। "चाची, कोई देख लेगा," उसने फुसफुसाते हुए कहा।
"इस मैदान में इस वक्त परिंदा भी नहीं आता, और वो देख, वहाँ झाड़ियों के पीछे कितनी अच्छी जगह है," सुनीता ने दूर इशारा किया। उसने स्कूटी वहीं झाड़ियों की ओर मोड़ दी। रोहन के हाथ अब खुद उसकी कमर से फिसलकर उसके पेट पर आ गए थे। सुनीता ने कोई एतराज़ नहीं किया, बल्कि उसके हाथों को अपने हाथों से दबा दिया।
झाड़ियों के पीछे स्कूटी खड़ी करके सुनीता उतरी। घास ओस से गीली थी, सुबह की पहली धूप पेड़ों के बीच से छन रही थी। "आ," उसने रोहन का हाथ पकड़ा और उसे घास पर बिठा लिया। "चाची, ये... ये ठीक है?" रोहन ने पूछा। सुनीता ने उसके होंठों पर उँगली रख दी, "शशश... आज तू सिर्फ मेरी सुन।"
उसने रोहन का चेहरा अपने हाथों में लिया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। पहला चुंबन धीमा था, झिझक भरा, पर जब रोहन ने जवाब दिया तो सुनीता ने उसे ज़ोर से भींच लिया। उसकी जीभ उसके मुँह में घुसी, उसकी लार का स्वाद मीठा था। रोहन के हाथ उसकी पीठ पर घूमने लगे, और सुनीता ने एक हल्की सी कराह उसके होंठों में ही दबा दी।
"इतने सालों से देख रही हूँ तुझे, कब का जवान हो गया मेरा रोहन," सुनीता ने उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा और उसकी गर्दन पर काट लिया। रोहन ने कराहते हुए कहा, "चाची, आपने तो मुझे पागल कर दिया है।" सुनीता हँसी, "पागल तो मैं तुझे और करूँगी, बस देखता जा।" उसने अपने सूट के ऊपर के दो बटन खोल दिए।
रोहन की आँखें फैल गईं। सुनीता की गोरी छाती ब्लाउज़ के अंदर से झलक रही थी, उसके बड़े बूब्स हर साँस के साथ ऊपर नीचे हो रहे थे। "छू ना, डर मत," उसने उसका हाथ पकड़कर अपने सीने पर रख दिया। रोहन ने पहली बार किसी औरत के बूब्स को छुआ। वो नरम, गरम और भारी थे। उसने धीरे से दबाया और सुनीता ने आँखें बंद करके सिसकी भरी।
"हाँ, ऐसे ही... और ज़ोर से दबा," सुनीता ने कहा। रोहन ने उसका ब्लाउज़ पूरी तरह खोल दिया और ब्रा का हुक भी खोल दिया। उसके बूब्स आज़ाद होकर बाहर आ गए, निप्पल तने हुए, गुलाबी। रोहन ने एक निप्पल मुँह में ले लिया और चूसने लगा। सुनीता ने उसके बाल पकड़ लिए, "आह... रोहन... चूस, और चूस।"
उसके हाथ रोहन की शर्ट के बटन खोलने लगे। "तू भी तो दिखा, सिर्फ मैं ही क्यों नंगी होऊँ," उसने शरारत से कहा। रोहन ने शर्ट उतार दी। सुनीता ने उसकी छाती पर हाथ फेरा, उसकी उँगलियाँ उसके निप्पलों पर घूमीं, फिर नीचे पेट तक आईं। "छब्बीस साल का जवान मर्द," उसने कहा और उसकी पैंट की ज़िप खींच दी।
रोहन का लंड अंडरवियर में तना हुआ था, साफ दिख रहा था। सुनीता ने उसे अंडरवियर के ऊपर से ही पकड़ लिया और दबाया। "उफ़्फ... कितना बड़ा है," उसने कहा। रोहन ने कराहते हुए कहा, "चाची, बस करो, निकल जाएगा।" सुनीता ने हँसते हुए अंडरवियर नीचे खींच दिया। उसका लंड उछलकर बाहर आ गया, लंबा, मोटा, नसें फूली हुईं।
"इतना सुंदर लंड मैंने बरसों बाद देखा है," सुनीता ने कहा और उसे अपने हाथ में लेकर ऊपर नीचे हिलाने लगी। फिर उसने झुककर उसकी टोपी पर जीभ फेरी। रोहन के मुँह से चीख निकल गई, "चाची! आह!" सुनीता ने पूरा लंड मुँह में ले लिया और चूसने लगी। उसकी जीभ हर नस पर घूम रही थी, और रोहन की कमर अपने आप हिलने लगी।
"रुक चाची, मैं... मैं झड़ जाऊँगा," रोहन ने हाँफते हुए कहा। सुनीता ने मुँह हटाया, लंड पर उसकी लार चमक रही थी। "अभी नहीं, अभी तो बहुत कुछ बाकी है," उसने कहा। फिर उसने अपनी सलवार का नाड़ा खोला और सलवार नीचे सरका दी। उसकी गोरी जाँघें और उसके बीच काली झाँटों से ढकी चूत रोहन के सामने थी।
"आ, चाट इसे," सुनीता ने घास पर लेटते हुए कहा और अपनी टाँगें फैला दीं। रोहन ने झुककर उसकी चूत पर जीभ रखी। खट्टा मीठा स्वाद, गीली और गरम। उसने चाटना शुरू किया, पहले धीरे, फिर तेज़। सुनीता की कमर उछलने लगी, "हाँ... हाँ... वहीं... आह... मेरी चूत चाट, और अंदर जीभ डाल।"
रोहन ने उसकी चूत को चाट चाटकर लाल कर दिया। सुनीता का पानी निकलने लगा, उसकी चूत से रस बह रहा था। "बस, अब और नहीं... अब डाल इसे अंदर," उसने हाँफते हुए कहा और रोहन को अपनी ओर खींचा। रोहन उसके ऊपर आया, उसका लंड उसकी गीली चूत के मुँह पर था। सुनीता ने खुद उसकी कमर पकड़कर उसे अंदर धकेला।
"आह्ह्ह...!" दोनों के मुँह से एक साथ आवाज़ निकली। रोहन का पूरा लंड सुनीता की चूत में समा गया। इतनी टाइट, इतनी गरम चूत उसे कभी नहीं मिली थी। सुनीता ने अपनी टाँगें उसकी कमर पर लपेट दीं। "धीरे मत कर, ज़ोर से चोद मुझे," उसने कहा। रोहन ने धक्के लगाने शुरू किए, पहले धीरे, फिर तेज़।
हर धक्के पर सुनीता की चूत से फच फच की आवाज़ आ रही थी। "हाँ... ऐसे ही... और अंदर... मेरी चूत फाड़ दे," वो चिल्ला रही थी। रोहन ने उसके बूब्स पकड़ लिए और दबाते हुए चोदता रहा। पसीना दोनों के जिस्मों पर था, सुबह की ठंडी हवा में भी उन्हें गर्मी लग रही थी। घास उनकी पीठ में चुभ रही थी, पर किसी को परवाह नहीं थी।
"रुक, अब ऐसे," सुनीता ने कहा और उसे पलटकर खुद ऊपर आ गई। उसने लंड को अपनी चूत में डाला और उछलने लगी। उसके बूब्स हवा में उछल रहे थे, रोहन ने उन्हें पकड़ लिया। "चाची, आप तो... आह... बहुत...," रोहन बड़बड़ा रहा था। सुनीता ने उसके मुँह पर हाथ रखा, "शशश... चोदने दे मुझे, बोल मत।"
सुनीता की रफ्तार बढ़ती गई। उसकी चूत लंड को निचोड़ रही थी। "मैं आने वाली हूँ... आह... रोहन... मैं झड़ रही हूँ...!" वो चीखी और उसका पूरा शरीर काँपने लगा। उसकी चूत से पानी की धार निकली, रोहन का पेट गीला हो गया। वो उसके ऊपर ही ढेर हो गई, हाँफती हुई, पसीने से तर।
"अभी खत्म नहीं हुआ," रोहन ने कहा और उसे पलटकर घुटनों के बल कर दिया। उसने पीछे से उसकी चूत में लंड डाला। सुनीता ने घास पकड़ ली। "हाँ... कुत्ती बना के चोद... मुझे यही पसंद है," उसने कहा। रोहन ने उसके कूल्हे पकड़े और ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाए। उसके कूल्हों की थपथपाहट पूरे मैदान में गूँज रही थी।
रोहन की रफ्तार अब बेकाबू थी। "चाची... मैं... मैं आने वाला हूँ... कहाँ निकालूँ?" उसने हाँफते हुए पूछा। सुनीता ने कहा, "अंदर ही... मेरी चूत में ही झड़ जा... भर दे इसे।" रोहन ने आखिरी ज़ोर का धक्का लगाया और उसका वीर्य सुनीता की चूत में छूट गया। दोनों एक साथ कराहे, और रोहन उसके ऊपर ही गिर पड़ा।
कुछ देर दोनों ऐसे ही पड़े रहे, नंगे, पसीने में भीगे, सुबह की धूप अब उनके जिस्मों पर पड़ रही थी। सुनीता ने उसके माथे पर चुंबन दिया और धीरे से कहा, "कल फिर आएगा ना... स्कूटी सीखने?" रोहन ने मुस्कुराते हुए उसके बूब पर हाथ फेरा, "चाची, स्कूटी तो मैं सीख गया... अब तो रोज़ आऊँगा।"
अगली सुबह रोहन पाँच बजे से पहले ही मैदान पहुँच गया था। स्कूटी की आवाज़ सुनकर सुनीता मुस्कुराई, "आज तो चेला गुरु से पहले आ गया।" रोहन ने स्कूटी रोकी और बोला, "चाची, आज मैं खुद चलाऊँगा, आप पीछे बैठिए।" सुनीता पीछे बैठी और इस बार उसने कोई देर नहीं की, उसके हाथ सीधे रोहन के सीने पर आ गए।
"कल वाली प्रैक्टिस याद है ना?" उसने उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा और उसकी गर्दन पर जीभ फेर दी। रोहन का लंड तुरंत तन गया। "चाची, ऐसे में स्कूटी कैसे चलाऊँ?" सुनीता हँसी, "चलाने की ज़रूरत ही क्या है, सीधे झाड़ियों के पीछे ले चल।" रोहन ने स्कूटी घुमाई और सीधे वहीं ले गया जहाँ कल उनकी चुदाई हुई थी।
स्कूटी खड़ी करते ही सुनीता ने उसे घास पर धकेल दिया। "आज मैं तुझे कुछ नया सिखाऊँगी," उसने कहा और उसकी पैंट खींचकर उतार दी। उसका लंड देखकर उसने होंठों पर जीभ फेरी। "कल तूने मेरी चूत चाटी थी, आज मैं तेरे लंड को प्यार करूँगी।" उसने लंड मुँह में लिया और गले तक उतार लिया। रोहन की आँखें ऊपर चढ़ गईं।
सुनीता का मुँह गरम था, उसकी जीभ लंड के हर हिस्से पर घूम रही थी। वो चूसती, चाटती, कभी टोपी पर दाँत गड़ाती। "चाची... आह... बस...," रोहन कराह रहा था। सुनीता ने मुँह हटाया और उसके ऊपर बैठ गई। उसने सलवार पहले ही उतार रखी थी। "आज बिना रुके, एक ही बार में," उसने कहा और लंड को चूत में डालकर उछलने लगी।
सुबह की ठंडी हवा में दोनों के जिस्म पसीने से चमक रहे थे। सुनीता की चूत से पानी बह रहा था, रोहन की जाँघें गीली हो गई थीं। "और तेज़... हाँ... मेरी चूत में और अंदर...," वो बड़बड़ा रही थी। रोहन ने उसके बूब्स मुँह में ले लिए और चूसने लगा। दोनों की साँसें एक हो गई थीं, धड़कनें एक।
"मैं झड़ने वाली हूँ... रोहन... पकड़ मुझे...," सुनीता चीखी और उसका शरीर ऐंठ गया। उसकी चूत ने लंड को ज़ोर से निचोड़ा और रोहन भी नहीं रुक पाया। उसका वीर्य उसकी चूत में भर गया। दोनों घास पर लेट गए, आसमान में सूरज निकल रहा था। सुनीता ने कहा, "स्कूटी सीखनी है तो रोज़ आना पड़ेगा, समझे?" रोहन हँसा, "चाची, अब तो ये मेरी रोज़ की क्लास है।"
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