भाभी की चुदाई की कहानी: झगड़े वाली रात
यह भाभी की चुदाई की कहानी उसी झगड़े वाली रात से शुरू होती है, जब दिल्ली के एक छोटे से फ्लैट में दो लोग एक दूसरे पर चिल्ला रहे थे। आवाजें दीवारों से टकराकर वापस आ रही थीं। और दोनों में से कोई भी हार मानने को तैयार नहीं था।
तुम्हें पता भी है कितने पैसे उड़ा दिए तुमने इस महीने। कविता की आवाज गुस्से से काँप रही थी। उसने बिजली का बिल लिविंग रूम की टेबल पर पटक दिया।
बिल देना मेरा काम नहीं है भाभी। अमन सोफे से उठकर खड़ा हो गया। उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। मैं पैसे कमाता हूँ, हिसाब नहीं देता।
हिसाब। कविता ने जोर से हँसी उड़ाई। रात के दो दो बजे घर आते हो, दोस्तों के साथ पार्टी करते हो, और हिसाब माँगने पर तुम्हें बुरा लगता है। तुम्हारे भैया दस दिन के टूर पर गए हैं, और तुमने घर को धर्मशाला बना रखा है।
भैया भैया भैया। अमन ने मुट्ठी भींच ली। हर बात में भैया। मैं छब्बीस साल का हूँ, बच्चा नहीं हूँ।
तो बच्चों जैसी हरकतें क्यों करते हो। कविता उसके करीब आ गई। इतनी करीब कि दोनों की साँसें आपस में टकरा रही थीं।
फ्लैट की हवा भारी हो गई थी। पंखा चल रहा था, पर पसीना दोनों के माथे पर चमक रहा था। बाहर गली में कुत्ते भौंक रहे थे।
तुम हमेशा यही करती हो। अमन की आवाज धीमी हो गई, पर खतरनाक। मुझे नीचा दिखाती हो। जैसे मैं तुम्हारा नौकर हूँ।
और तुम हमेशा यही करते हो। कविता की आँखों में आँसू और गुस्सा दोनों थे। भाग जाते हो। जिम्मेदारी से, घर से, हर चीज से।
खामोशी छा गई। दोनों एक दूसरे को घूर रहे थे। कविता की छाती तेजी से ऊपर नीचे हो रही थी।
अमन ने एक कदम आगे बढ़ाया। अब उनके बीच मुश्किल से एक हाथ की दूरी थी। उसकी नजर कविता के चेहरे से फिसलकर उसके गले तक आई, फिर वापस।
फिर कहो। उसने धीरे से कहा। कहो कि मैं भागता हूँ।
कविता के होंठ हिले, पर आवाज नहीं निकली। उसके गाल लाल हो गए थे। गुस्से से या किसी और चीज से, वो खुद नहीं जानती थी।
अमन। उसने सिर्फ उसका नाम कहा। चेतावनी जैसी।
क्या अमन। अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी कलाई पतली थी, पर मजबूत। तुम लड़ना चाहती हो ना। तो लड़ो।
उसने कविता को अपनी तरफ खींचा। कविता ने छुड़ाने की कोशिश की, पर उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई। उनकी साँसें अब एक हो गई थीं।
छोड़ो मुझे। कविता ने फुसफुसाकर कहा। पर उसके हाथ अमन की छाती पर टिके रहे, धक्का देने के बजाय वहीं रुके रहे।
अमन ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया। एक पल के लिए दोनों ठिठक गए। फिर उसके होंठ कविता के होंठों पर आ गए।
पहला चुम्बन गुस्से से भरा था। दाँत टकराए। कविता ने उसके निचले होंठ को काटा। अमन ने जवाब में उसे और जोर से भींच लिया।
ये गलत है। कविता ने उसके होंठों से अलग होते हुए कहा। पर वो पीछे नहीं हटी।
तो रोक लो मुझे। अमन ने कहा, और फिर से उसके होंठ चूम लिए। इस बार धीरे, गहरा, माँग भरा।
कविता के हाथ अब उसकी गर्दन में थे। उसके नाखून अमन की त्वचा में धँस रहे थे। झगड़े की सारी गर्मी अब किसी और आग में बदल रही थी।
अमन ने उसे सोफे की तरफ धकेला। कविता सोफे पर गिरी, और अमन उसके ऊपर झुक गया। उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से सरक गया।
तुम पागल हो। कविता हाँफ रही थी। उसकी आँखें चमक रही थीं।
तुम्हारी वजह से। अमन ने उसके ब्लाउज के बटन खोलने शुरू कर दिए। एक, दो, तीन। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर रुक नहीं रही थीं।
ब्लाउज खुलते ही कविता की छाती सामने आ गई। ब्रा के ऊपर से ही अमन ने उन्हें अपने हाथों में भर लिया। कविता के मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकली।
धीरे। उसने कहा। पर उसकी कमर अपने आप अमन की तरफ उठ रही थी।
अमन ने ब्रा का हुक खोला। कविता के स्तन आजाद हो गए। उसने एक को मुँह में ले लिया। जीभ से निप्पल को चाटा, फिर धीरे से काटा।
आह। कविता ने उसके बाल पकड़ लिए। उसकी पीठ सोफे पर धनुष जैसी मुड़ गई।
अमन का एक हाथ नीचे सरका। साड़ी को ऊपर उठाया। पेटीकोट के ऊपर से ही उसने कविता की जाँघों के बीच दबाव डाला।
वहाँ गीलापन था। साफ महसूस हो रहा था। कविता ने शर्म से चेहरा फेर लिया, पर टाँगें नहीं बंद कीं।
देखो। अमन ने फुसफुसाया। तुम भी यही चाहती हो। झगड़ा तो बस बहाना था।
चुप रहो। कविता ने कहा, और उसे खींचकर फिर चूम लिया।
अमन ने उसकी पैंटी को एक तरफ सरकाया। उँगली अंदर गई। कविता की चूत गर्म और गीली थी। उँगली आसानी से फिसल गई।
उसने उँगली को अंदर बाहर करना शुरू किया। कविता की साँसें तेज हो गईं। उसके कूल्हे हर धक्के के साथ उठ रहे थे।
अमन। उसने उसका नाम इस बार अलग अंदाज में कहा। भीख जैसी।
अमन ने अपनी पैंट खोली। उसका लंड तना हुआ था, नसें उभरी हुईं। उसने उसे कविता की चूत के मुँह पर रखा।
कविता ने उसे देखा। फिर अमन की आँखों में देखा। और धीरे से सिर हिलाया। हाँ।
एक ही धक्के में वो अंदर चला गया। कविता के मुँह से जोर की आवाज निकली। उसने जल्दी से अपना हाथ मुँह पर रखा।
दीवारें पतली थीं। पड़ोसी सुन सकते थे। पर अब रुकना नामुमकिन था।
अमन ने धक्के लगाने शुरू किए। पहले धीरे, फिर तेज। सोफा दीवार से टकराने लगा। थप थप की आवाज कमरे में गूँज रही थी।
कविता की टाँगें उसकी कमर से लिपटी हुई थीं। हर धक्के पर वो उसे और अंदर खींच रही थी।
और जोर से। उसने दाँत भींचकर कहा।
अमन ने उसकी बात मानी। उसके धक्के अब जानवरों जैसे हो गए थे। पसीना दोनों के बदन से टपक रहा था।
कविता का बदन काँपने लगा। उसकी चूत ने अमन के लंड को जोर से जकड़ लिया। वो झड़ रही थी।
उसकी चीख को अमन ने अपने होंठों से दबा दिया। दोनों का बदन एक साथ काँपा।
अमन ने खुद को रोक लिया। वो अभी झड़ना नहीं चाहता था। उसने लंड बाहर निकाला। दोनों हाँफ रहे थे।
पानी। कविता ने कहा। प्लीज।
अमन किचन में गया। दो गिलास पानी लाया। कविता ने साड़ी ठीक की, पर ब्लाउज खुला ही रहने दिया।
किचन की ट्यूबलाइट की रोशनी में वो और भी खूबसूरत लग रही थी। बिखरे बाल, लाल गाल, खुला ब्लाउज।
तुम्हारे भैया को पता चला तो। कविता ने पानी पीते हुए कहा। उसकी आवाज में डर था, पर आँखों में कुछ और।
तो। अमन उसके पीछे आकर खड़ा हो गया। उसके हाथ कविता की कमर पर थे। उन्हें पता नहीं चलेगा।
उसने कविता की गर्दन पर चुम्बन दिया। कविता ने गिलास स्लैब पर रखा। उसका बदन फिर से गर्म होने लगा था।
अमन ने उसे घुमाया। अब कविता का चेहरा उसकी तरफ था। पीठ स्लैब से टिकी हुई थी।
तुम बहुत बुरे हो। कविता ने मुस्कुराते हुए कहा। पहली बार उस रात वो मुस्कुराई थी।
और तुम बहुत अच्छी। अमन ने उसके स्तनों को फिर से हाथों में लिया। निप्पलों को उँगलियों से मरोड़ा।
कविता ने उसके कंधे पर सिर टिका दिया। अमन, नीचे। उसने इशारा किया।
अमन समझ गया। वो घुटनों पर बैठ गया। कविता की साड़ी ऊपर उठाई। पैंटी नीचे सरकाई।
उसकी चूत सामने थी। गीली, सूजी हुई, माँगती हुई। अमन ने जीभ लगाई।
कविता की उँगलियाँ उसके बालों में धँस गईं। उसकी टाँगें काँप रही थीं। स्लैब का किनारा उसकी कमर में धँस रहा था।
अमन ने जीभ को अंदर तक धकेला। फिर दाने को चूसा। कविता के मुँह से लगातार सिसकियाँ निकल रही थीं।
बस, बस अब। उसने हाँफते हुए कहा। मैं फिर से।
अमन खड़ा हुआ। उसने कविता को स्लैब पर बिठाया। उसकी टाँगें फैलाईं। लंड को चूत पर रखा।
इस बार वो धीरे अंदर गया। पूरा। कविता ने उसे अपनी बाहों में भर लिया।
किचन में सिर्फ दोनों की साँसों की आवाज थी। और गीली चूत में फिसलते लंड की हल्की आवाज।
तुम्हारी चूत बहुत टाइट है भाभी। अमन ने उसके कान में कहा।
चुप। कविता ने शर्माते हुए कहा। पर उसके कूल्हे जवाब दे रहे थे। हर धक्के पर वो आगे बढ़ रही थी।
अमन ने एक हाथ से उसका एक स्तन पकड़ा, दूसरे से उसकी कमर। धक्कों की रफ्तार बढ़ा दी।
स्लैब हिल रहा था। ऊपर रखे बर्तन खनक रहे थे। कविता ने एक हाथ से स्टील का डिब्बा पकड़ लिया ताकि गिरे नहीं।
मैं आ रही हूँ। उसने चीख को दबाते हुए कहा।
साथ में। अमन ने कहा। उसने धक्के और तेज कर दिए।
कविता का बदन ऐंठ गया। उसकी चूत ने लंड को निचोड़ा। अमन ने आखिरी धक्का लगाया और रुक गया।
पर वो झड़ा नहीं। उसने दाँत भींच लिए। अभी नहीं। अभी एक और बाकी था।
उसने लंड बाहर निकाला। कविता स्लैब से उतरी। उसकी टाँगें काँप रही थीं।
बेडरूम। अमन ने कहा। उसने कविता का हाथ पकड़ा।
बेडरूम में एसी चल रहा था। ठंडी हवा गर्म बदन पर अच्छी लग रही थी। बिस्तर बिखरा हुआ था।
कविता बिस्तर पर गिरी। अमन उसके ऊपर आया। अब कोई जल्दी नहीं थी। अब वो खेलना चाहता था।
उसने कविता की साड़ी पूरी खोल दी। पेटीकोट भी। अब वो पूरी नंगी थी। ट्यूबलाइट की जगह बेडरूम की पीली रोशनी में उसका बदन चमक रहा था।
तुम बहुत सुंदर हो। अमन ने कहा। सच में।
कविता ने उसकी शर्ट के बटन खोले। शर्ट उतारी। फिर उसकी पैंट। अब दोनों नंगे थे।
कविता ने उसके लंड को हाथ में लिया। ऊपर नीचे किया। अमन की साँस अटक गई।
तुम्हारा ये। उसने शरारत से कहा। बहुत बड़ा है।
तुम्हारे लिए ही है। अमन ने जवाब दिया।
कविता ने उसे मुँह में ले लिया। पहले सिर्फ टोपा। फिर आधा। फिर जितना जा सका।
अमन ने उसके बाल पकड़ लिए। उसका सिर ऊपर नीचे हो रहा था। जीभ लंड के नीचे वाले हिस्से को चाट रही थी।
उफ़। अमन के मुँह से निकला। उसकी टाँगों की मांसपेशियाँ तन गईं।
कविता ने लंड बाहर निकाला। उस पर थूका। फिर से मुँह में लिया। इस बार तेज।
अमन को लगा वो अब झड़ जाएगा। उसने कविता को रोका। बस। अब मेरी बारी।
उसने कविता को घोड़ी बनाया। बिस्तर पर उसके हाथ और घुटने। उसकी चूत पीछे से सामने थी। गीली और खुली।
अमन पीछे से अंदर गया। एक ही बार में पूरा। कविता के मुँह से जोर की आह निकली।
उसने उसके कूल्हों को पकड़ा। धक्के लगाने शुरू किए। तेज, गहरे, बेरहम।
बिस्तर दीवार से टकरा रहा था। कविता की चूड़ियाँ खनक रही थीं। उसकी सिसकियाँ अब चीखों में बदल रही थीं।
हाँ, हाँ, ऐसे ही। वो चिल्ला रही थी। और अंदर।
अमन ने उसके बाल पकड़े। हल्के से खींचा। कविता की पीठ धनुष जैसी मुड़ गई।
तुम्हें ये पसंद है ना। अमन ने कहा। झगड़ना भी, और ये भी।
हाँ। कविता ने कबूल किया। हाँ, मुझे पसंद है।
अमन ने पोजीशन बदली। कविता को सीधा लिटाया। उसकी टाँगें अपने कंधों पर रखीं। फिर अंदर गया।
इस पोजीशन में वो सबसे गहरा जा रहा था। कविता की आँखों में आँसू थे। दर्द और मजे के।
उसने कविता के स्तनों को पकड़ा। निप्पलों को मसलता रहा। नीचे धक्के जारी थे।
कविता का तीसरा चरम करीब था। उसका बदन काँप रहा था। चूत लंड को बार बार जकड़ रही थी।
अमन भी अब किनारे पर था। उसने आखिरी ताकत लगाई। धक्के इतने तेज थे कि बिस्तर की चादर फिसल गई।
कविता चीखी। उसका बदन ऐंठ गया। और उसी पल अमन भी झड़ गया।
गर्म धार उसकी चूत में उतर गई। दोनों का बदन पसीने से तर था। दोनों हाँफ रहे थे।
अमन उसके ऊपर ही लुढ़क गया। उसका सिर कविता की छाती पर था। उसकी धड़कन तेज थी।
कमरे में खामोशी थी। सिर्फ एसी की आवाज। और दो तेज धड़कनें।
बिल का क्या होगा। कविता ने धीरे से कहा। उसकी उँगलियाँ अमन के बालों में थीं।
अमन हँसा। थका हुआ, खुश हँसी। बिल मैं दे दूँगा। पर शर्त है।
कैसी शर्त।
हर महीने एक झगड़ा। अमन ने सिर उठाकर उसे देखा। ऐसा ही झगड़ा।
कविता ने उसे धक्का दिया। पर वो मुस्कुरा रही थी। बदमाश। उसने कहा।
तुम्हारा बदमाश। अमन ने उसके माथे पर चुम्बन दिया।
बाहर गली में कुत्ते अब भी भौंक रहे थे। पर फ्लैट के अंदर अब कोई शोर नहीं था। सिर्फ दो लोगों की साँसें, एक लय में।
कविता ने लाइट बंद की। अँधेरे में उसने अमन का हाथ पकड़ा। और दबाया। कल फिर लड़ोगे। उसने फुसफुसाया। ये सवाल नहीं था।
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