टीचर की चुदाई की कहानी: जयपुर में प्राइवेट ट्यूशन का खेल
"दरवाज़ा बंद कर दो," मीरा मैडम बोलीं, और अर्जुन के हाथ काँपने लगे, क्योंकि यही वह लम्हा था जिससे हर टीचर की चुदाई की कहानी शुरू होती है। उसकी उँगलियाँ कुंडी पर फिसलीं, दूसरी बार में कुंडी लगी। खट। वह आवाज़ इतनी तेज़ थी कि उसका अपना दिल धड़कना भूल गया।
मीरा शर्मा, पैंतीस साल, जयपुर के सिटी कॉलेज रोड पर एक किराए के मकान में रहती थीं। स्कूल टीचर। पति हिंदुस्तान पेट्रोलियम में सेल्स मैनेजर, महीने के अठारह दिन बाहर। अर्जुन बाईस का था, बी.कॉम सेकंड ईयर, SSC की तैयारी में डूबा। शाम सात से आठ, मैथ्स ट्यूशन। उसकी माँ ने ही मैडम से बात की थी, क्योंकि अर्जुन का क्वांट सेक्शन डूबता जा रहा था।
"बैठो," मीरा बोलीं। कुर्सी स्टडी टेबल के इतनी पास थी कि अर्जुन को खिसकना पड़ा। आज उन्होंने काली साड़ी नहीं पहनी थी। गहरे हरे रंग का सलवार कुर्ता, और कुर्ता इतना टाइट कि उठते-बैठते उनके उभरे हुए चूचे हिलते दिखते। अर्जुन ने नज़रें झुका लीं। माथे पर पसीना चमक आया।
"आज प्रॉफिट लॉस के चैप्टर से शुरू करते हैं," उन्होंने किताब खोली। "देखो, क्वेश्चन पढ़ो।" उनकी साँसों की गर्मी अर्जुन के गाल पर छू रही थी। वह इतना पास बैठी थीं कि उनकी जांघ उसकी जांघ से सटी हुई थी।
अर्जुन ने सवाल पढ़ा, पर अक्षर तैर रहे थे। उसके सामने सिर्फ़ मैडम के होठों की हिलन दिख रही थी। हल्की गुलाबी लिपस्टिक, नीचे का होंठ मोटा। "समझ आया?" उन्होंने पूछा। "ह... हाँ," अर्जुन ने झूठ बोला।
"झूठ बोल रहे हो।" मीरा की उँगली उसके नोटबुक के पेज पर उतरी, और धीरे-धीरे उसके हाथ के ऊपर से फिसलती हुई उसकी कलाई तक आ गई। उँगलियाँ ठंडी थीं, और स्पर्श इतना लंबा कि अर्जुन की साँस अटक गई। "फिर से समझाती हूँ। ध्यान दो।"
पर ध्यान कहाँ था। मीरा का दुपट्टा खिसककर कुर्सी की बाँह पर लटका था। कुर्ते की नेकलाइन से उनके भरे हुए सीने की गहराई दिख रही थी। साँस लेते वक्त ऊपर नीचे होती नरम गोलाइयाँ। अर्जुन का लंड पैंट में तनने लगा, और उसने किताब गोद में खिसकाई।
"क्या हुआ, अर्जुन?" मीरा की आँखों में शरारत थी। "चेहरा लाल क्यों हो रहा है? बुखार है क्या?" उनका हाथ बढ़ा, और उनकी हथेली उसके माथे पर आ टिकी। नरम। गर्म। हथेली उतरती हुई उसके गाल पर रुकी। "नहीं, बुखार नहीं। कुछ और ही है।"
अर्जुन का गला सूख गया। "मैडम, वो..." "श्श।" उनकी उँगली उसके होठों पर आ गई। "मैं देख रही हूँ तुम्हें हफ़्तों से। कैसे नज़रें चुराते हो।" वह मुस्कुराईं। "बुरा लग रहा है क्या?"
"न... नहीं।" "फिर अच्छा लग रहा है।" यह सवाल नहीं था। उनका हाथ उसके गाल से उतरता हुआ गर्दन पर आया, फिर कंधे पर। उँगलियाँ धीरे-धीरे उसकी शर्ट के बटन की ओर बढ़ रही थीं। "पति परसों आने वाले थे। अभी फोन आया, ट्रिप बढ़ गई। अब पंद्रह दिन बाद।"
अर्जुन समझ गया। वह रात अलग थी। मीरा उठीं, दरवाज़े के पास गईं, और अंदर के कमरे की लाइट जला दी। "ट्यूशन ख़त्म।" उन्होंने किताब बंद की। "आज दूसरा पाठ।" वह उसके सामने खड़ी हुईं, हाथ कमर पर। "शर्ट उतारो।"
अर्जुन की उँगलियाँ बटन पर काँप रही थीं। पहला बटन। दूसरा। मीरा देख रही थीं, आँखों में भूख। जब शर्ट उतरी, उन्होंने उसके सीने पर हाथ फेरा। नाखून हल्के से गड़े। "इतना डरा हुआ क्यों है? मैं काटूँगी नहीं।" वह हँसीं, और हँसते हुए उनका सीना हिला। "शायद थोड़ा।"
उन्होंने उसे कुर्सी से उठाया और स्टडी टेबल के सामने खड़ा किया। फिर वह ख़ुद टेबल पर बैठ गईं, टाँगें फैलाकर। कुर्ता ऊपर खिसक गया, और उनकी गोरी जांघें नंगी दिखने लगीं। सलवार का नाड़ा ढीला था। "आओ। पास आओ।" अर्जुन आगे बढ़ा, और उसकी टाँगें उनकी टाँगों के बीच आ गईं।
मीरा ने उसके चेहरे को दोनों हाथों में लिया और अपने होठों से उसके होंठ दबा दिए। पहला चुम्बन। गर्म, गीला, ज़बरदस्त। उनकी जीभ उसके मुँह में घुसी, और अर्जुन ने पहली बार किसी औरत की जीभ चखी। नमकीन, मीठी। उसके हाथ अपने आप उनकी कमर पर चले गए।
"अच्छे लड़के," मीरा ने उसके होंठ चबाते हुए कहा। "अब मेरे कुर्ते के बटन खोलो।" अर्जुन ने काँपते हाथों से बटन खोले। एक। दो। तीन। कुर्ता खुला, और अंदर काले रंग की ब्रा में क़ैद उनके बड़े-बड़े चूचे सामने आ गए। इतने भरे कि ब्रा के कप ऊपर से उभर रहे थे।
मीरा ने ख़ुद ब्रा का हुक खोला। चूचे आज़ाद हुए, भारी, लटकते हुए, निप्पल गहरे भूरे और तने हुए। "छुओ।" अर्जुन ने दोनों हाथों से उनके चूचे पकड़ लिए। नरम, गर्म, भारी। उसने निप्पल को उँगलियों से मसलना शुरू किया, और मीरा की साँस तेज़ हो गई।
"आह... ऐसे ही... दबाओ..." मीरा ने उसका सिर अपने सीने पर दबा दिया। अर्जुन ने एक निप्पल मुँह में लिया और चूसने लगा। ज़ोर से। जीभ से घुमाते हुए। मीरा की उँगलियाँ उसके बालों में गड़ गईं। "हाँ... चूसो... और ज़ोर से..."
वह दूसरा निप्पल चूसता रहा, हाथ से पहले वाले को मसलता रहा। मीरा की जांघें उसकी कमर के इर्द-गिर्द कसने लगीं। उनकी साँसों में अब सिसकारियाँ थीं। "अर्जुन... मेरी सलवार उतारो..."
अर्जुन टेबल के सामने घुटनों पर बैठ गया। उसने सलवार का नाड़ा खींचा। सलवार नीचे सरकी। अंदर गुलाबी पैंटी, और पैंटी के बीच का हिस्सा गीला, चिपका हुआ। मीरा ने टाँगें और फैला दीं। "उतारो इसे भी।"
पैंटी उतरी, और अर्जुन के सामने पहली बार किसी औरत की नंगी चूत थी। गुलाबी, फूली हुई, गीली चमकती। झाँटें हल्की सी बढ़ी हुईं। मीठी सी गंध। अर्जुन ने बिना सोचे अपनी जीभ उनकी चूत पर रख दी।
"आआह!" मीरा की चीख़ निकली। "हाँ... चाटो... वहीं..." अर्जुन ने चूत के दाने को जीभ से छेड़ना शुरू किया। ऊपर नीचे। गोल गोल। मीरा का बदन काँपने लगा। उनकी उँगलियाँ उसके सिर को दबा रही थीं, चूत पर और ज़ोर से। "और अंदर... जीभ अंदर डालो..."
अर्जुन ने जीभ चूत के छेद में घुसेड़ दी। नमकीन पानी। मीरा की चूत का रस उसकी जीभ पर, उसके होठों पर। वह चाटता रहा, चूसता रहा। मीरा की टाँगें काँप रही थीं। "मैं... मैं आने वाली हूँ... मत रुको... मत रुको..."
और फिर मीरा का बदन ऐंठ गया। उनकी चूत से पानी छूटा, अर्जुन के मुँह पर, ठोड़ी पर। वह हाँफ रही थीं, टेबल पर पीछे झुकी हुई। "बहुत... बहुत दिनों बाद... किसी ने..." उन्होंने उसे ऊपर खींचा और उसके होठों को चूमा, अपने ही रस का स्वाद चखते हुए। "अब तुम्हारी बारी।"
मीरा टेबल से उतरीं और उसके सामने घुटनों पर बैठ गईं। उन्होंने ज़िप नीचे की, अंडरवियर खींचा, और अर्जुन का लंड बाहर उछल आया। लंबा, मोटा, टोपा लाल।
"बाप रे," मीरा की आँखें चमकीं। "इतना बड़ा... तुम्हारी उम्र में..." उन्होंने लंड को हाथ में लिया और हल्के से हिलाया। फिर जीभ निकालकर टोपे को चाटा। अर्जुन की साँस रुक गई। "मैडम... आह..." "श्श। मैडम नहीं। मीरा।"
मीरा ने लंड को मुँह में लिया। पहले टोपा, फिर धीरे-धीरे आधा लंड अंदर। गर्म मुँह। गीली जीभ टोपे पर घूम रही थी। वह चूसने लगीं, सिर ऊपर नीचे। अर्जुन ने उनके बाल पकड़ लिए। "आह... मीरा... बहुत अच्छा..."
वह चूसती रहीं, हाथ से नीचे का हिस्सा हिलाते हुए। लार टपक रही थी। "बस... मैं झड़ने वाला हूँ..." "नहीं," मीरा ने लंड मुँह से निकाला। "अभी नहीं। पहले मुझे चोदो।"
मीरा उठीं, उसे पकड़कर अंदर बेडरूम में ले गईं और बिस्तर पर धकेल दिया। वह उसके ऊपर चढ़ गईं, टाँगें फैलाकर। उन्होंने लंड पकड़ा, अपनी गीली चूत के मुँह पर रखा। "देखो मुझे," और धीरे-धीरे नीचे बैठने लगीं।
लंड चूत में घुसा। टाइट। गीला। गर्म। मीरा की आँखें बंद हो गईं। "आह... इतना मोटा... बहुत दिनों बाद..." वह पूरी तरह बैठ गईं, फिर हिलने लगीं। ऊपर नीचे।
अर्जुन ने उनके चूचे पकड़ लिए और नीचे से धक्के मारने लगा। मीरा उछल रही थीं, चूचे उछल रहे थे। बिस्तर चरमराया। "हाँ... चोदो... और ज़ोर से... आह..." उनकी चूत लंड को निचोड़ रही थी। पानी बह रहा था।
"पलटो," मीरा हाँफते हुए बोलीं। वह घोड़ी बन गईं, बिस्तर पर। अर्जुन पीछे आया, लंड पकड़कर चूत में घुसेड़ा। पीछे से धक्के। ज़ोर ज़ोर से। उसके हाथ उनकी कमर पर, नाखून गड़े। मीरा चिल्ला रही थीं। "हाँ! ऐसे ही! फाड़ दो मेरी चूत!"
अर्जुन ने बाल पकड़े और धक्के और तेज़ किए। पसीना टपक रहा था। मीरा की चूत से फच फच की आवाज़ आ रही थी। "मैं आ रही हूँ... आ रही हूँ..." उनका बदन ऐंठा, चूत ने लंड को ज़ोर से जकड़ा। दूसरी बार का पानी।
अर्जुन ने लंड बाहर निकाला। "लेट जाओ," उसने कहा। मीरा पीठ के बल लेटीं, टाँगें फैलाकर। अर्जुन उनके ऊपर आया, लंड फिर चूत में। मिशनरी। धक्के। उनकी आँखों में आँखें। "मीरा..." "चोदो मुझे... रुको मत..."
धक्के तेज़। बिस्तर हिल रहा था। अर्जुन की साँस फूल गई। "मैं झड़ने वाला हूँ... कहाँ..." "अंदर ही... मेरी चूत में ही झड़ो..." और अर्जुन झड़ गया। गर्म वीर्य चूत में भर गया। उसका बदन काँपा। वह उनके ऊपर ढह गया।
दोनों हाँफ रहे थे। पसीने से तर। मीरा ने उसके माथे को चूमा। "पहली बार था ना?" अर्जुन ने सिर हिलाया। "सबसे अच्छी पहली बार," मीरा मुस्कुराईं। "पति को पंद्रह दिन हैं। रोज़ शाम सात बजे। समझे?"
अगली शाम अर्जुन सात से पहले पहुँच गया। दरवाज़ा खुला था। मीरा बेडरूम में थीं, सिर्फ़ नाइटी में। "किताबें रहने दो," उन्होंने कहा। "आज टेबल पर नहीं, बिस्तर पर पढ़ाई होगी।" उन्होंने नाइटी उतार फेंकी। नंगी। चूचे, चूत, सब सामने।
अर्जुन ने कपड़े उतारे और बिस्तर पर कूद पड़ा। मीरा ने लंड मुँह में लिया, दो मिनट चूसा, फिर खुद लेट गईं। "आज तुम ऊपर।" अर्जुन उनके बीच आया। लंड चूत में घुसा, और धक्के शुरू। मीरा की टाँगें उसकी कमर पर लिपटीं।
"धीरे... पहले धीरे..." मीरा ने कहा। अर्जुन ने धीरे धक्के मारे, गहरे। हर धक्के पर लंड जड़ तक। मीरा की सिसकारियाँ बढ़ीं। "अब तेज़..." और तेज़। चूचे उछले। अर्जुन ने एक निप्पल मुँह में लिया, चूसते हुए चोदता रहा।
मीरा झड़ीं, चूत का पानी लंड पर। "पलटो," अर्जुन ने कहा। उसने मीरा को घोड़ी बनाया, पीछे से चोदा, चूतड़ों पर थप्पड़ मारते हुए। "आह! मारो... और मारो..." फिर दीवार के सहारे, एक टाँग उसके कंधे पर, खड़े-खड़े धक्के। "इतनी जगह... तुमने कहाँ सीखा..." "तुमसे ही सीख रहा हूँ।"
उस रात तीन बार। तीसरी बार मीरा ऊपर बैठकर झड़ीं। "कल मेरे पति का फोन आएगा," उन्होंने कहा। "कहूँगी सब ठीक है।" वह हँसीं, और हँसी में शैतानी थी।
तीसरी शाम मीरा ने लाल साड़ी में दरवाज़ा खोला, और एक झटके में साड़ी उतार दी। अर्जुन ने उन्हें स्टडी टेबल पर बिठाया, टाँगें फैलाकर चूत चाटी, फिर खड़े होकर टेबल पर ही चोदा। किताबें नीचे गिर गईं।
फिर उसने उन्हें गोद में उठाया, दीवार से टिकाकर चोदा। "मैं तुम्हारी हूँ... इन पंद्रह दिनों के लिए पूरी तुम्हारी..." "और उसके बाद?" "उसके बाद भी। ट्यूशन तो चलेगी ही।"
पाँचवीं शाम। मीरा बेडरूम में इंतज़ार कर रही थीं।
अर्जुन ट्यूशन के समय से पहले आया, और मीरा उसे देखकर हँसीं। "इतनी बेसब्री?" "तुम्हारे बिना रहा नहीं जाता," अर्जुन ने कहा। यह सुनकर मीरा की आँखें नरम हो गईं। उन्होंने उसे गले लगाया, लंबा चुम्बन।
उस रात बिस्तर पर उन्होंने बातें भी कीं। पति के बारे में। अकेलेपन के बारे में। "तुमने मुझे ज़िंदा कर दिया," मीरा ने कहा। अर्जुन ने उनके आँसू पोंछे। "तुमने मुझे मर्द बनाया," उसने कहा। फिर उन्होंने प्यार किया, धीरे, गहरे।
दसवीं शाम। दरवाज़े पर दस्तक। मीरा का चेहरा सफ़ेद। "पति... एक दिन पहले आ रहे हैं। कल सुबह।" दोनों के होठ सूख गए। "तो आज आख़िरी रात?" अर्जुन ने पूछा। मीरा ने उसे देखा, और धीरे से सिर हिलाया। "आज नहीं। कभी आख़िरी नहीं।"
उस रात उन्होंने सबसे ज़्यादा पागलपन किया। हर कोना। टेबल, बिस्तर, बाथरूम, रसोई की स्लैब। मीरा ने लंड चूसा, अर्जुन ने चूत चाटी। हर पोज़िशन। मिशनरी, घोड़ी, ऊपर, खड़े। दोनों तीन-तीन बार झड़े। पसीना, चीख़ें, वीर्य, पानी। सब कुछ।
सुबह चार बजे अर्जुन जाने लगा। मीरा ने उसे दरवाज़े पर रोका। नंगी, सिर्फ़ चादर लपेटे। उन्होंने उसके होठों को चूमा, लंबा, गहरा। "ट्यूशन जारी रहेगी," उन्होंने फुसफुसाकर कहा। "पति जाएँगे, तुम आओगे। शाम सात बजे। दरवाज़ा बंद कर देना।"
अर्जुन मुस्कुराया। "दरवाज़ा बंद कर दूँगा," उसने कहा। "और कुंडी भी लगा दूँगा।" मीरा ने उसकी आँखों में देखा। "अच्छे लड़के।" खट। दरवाज़ा बंद हुआ। और अर्जुन जानता था, यह कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई थी।
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