साली की चुदाई की कहानी: लखनऊ वाली रितिका
"जीजाजी," रितिका ने चाय का कप उसके हाथ में थमाते हुए आंख मारी, "तुमने कभी ये सोचा कि साली की चुदाई की कहानी वाली फिल्मों में जीजा हमेशा इतना डरपोक क्यों होता है।"
निशांत का हाथ कांप गया। गरम चाय छलककर कप के किनारे से बह निकली। रसोई में प्रेशर कुकर की सीटी और खिड़की के बाहर हल्की बूंदाबांदी के बीच उसके कान में अपना ही दिल धड़कता सुनाई दिया।
"क्या बकवास है ये," उसने जबरन हंसी हंसते हुए कहा, "किरण आ जाएगी तो लेने के देने पड़ जाएंगे।" रितिका ने अपने होंठों पर उंगली रख दी। उसकी आंखों में शरारत नाच रही थी।
"दीदी आएंगी शाम को," वो किचन के काउंटर से टेक लगाकर बोली, "और वैसे भी मैं सिर्फ पूछ रही हूं। तुम इतना घबरा क्यों रहे हो, जीजू। डरपोक तो तुम लग रहे हो, फिल्मों वाले नहीं।"
निशांत ने चाय का घूंट भरा। छब्बीस की उम्र में ब्याह के बाद उसने कभी सोचा नहीं था कि चौबीस साल की साली इस तरह सीधे वार करेगी। रितिका लखनऊ आई थी सरकारी परीक्षा की कोचिंग के लिए, पूरे एक महीने के लिए।
"मैं डरपोक नहीं हूं," उसने कहा, "बस समझदार हूं।" रितिका ने कप नीचे रखा। वो दो कदम आगे बढ़ी। उसके कुर्ते का दुपट्टा कंधे से सरककर काउंटर पर गिरा।
"अच्छा," उसने धीमी आवाज में कहा, "तो एक डेयर ले लो। अगर तुम सच में डरपोक नहीं हो तो।" उसकी सांसों की गर्मी निशांत के चेहरे पर पड़ रही थी।
"कैसा डेयर," निशांत की आवाज भारी हो गई। रितिका ने उसकी कलाई पकड़ी। उसकी उंगलियां नरम थीं, पर पकड़ मजबूत थी।
"यही," उसने फुसफुसाते हुए कहा, "कि तुम मुझे छूकर दिखाओ। बस एक बार। जैसे फिल्मों में जीजा करता है।" निशांत का गला सूख गया। बाहर बारिश तेज हो गई थी।
उसने रितिका की कमर पर हाथ रखा। सिर्फ एक पल के लिए। पर उस एक पल में उसके पूरे शरीर में करंट दौड़ गया। रितिका की आंखें बंद हो गईं।
"बस," निशांत ने हाथ हटाते हुए कहा, "डेयर पूरा।" रितिका ने आंखें खोलीं। उसके चेहरे पर जीत की मुस्कान थी।
"डरपोक," उसने चिढ़ाते हुए कहा और अपना कप उठाकर कमरे की तरफ चली गई। उसके जाते हुए हिप्स के हिलने पर निशांत की नजर ठहर गई। उसने खुद को डांटा।
शाम को किरण ऑफिस से आई तो घर सामान्य था। रितिका ने दीदी के गले लगकर खूब बातें कीं। निशांत ने लैपटॉप में मुंह गाड़ लिया। पर उसकी आंखें बार बार रितिका की तरफ उठ रही थीं।
तीन दिन ऐसे ही बीते। दिन में किरण ऑफिस जाती, निशांत घर से काम करता, और रितिका कोचिंग से दोपहर को लौट आती। हर दिन कोई न कोई छेड़छाड़ होती।
एक दिन रितिका बालकनी में कपड़े सुखा रही थी। निशांत पानी लेने निकला। रितिका ने जानबूझकर ऊंची रस्सी पर दुपट्टा फेंका और निशांत से मदद मांगी।
"जीजू, जरा ये पकड़ो तो," उसने कहा। निशांत ने हाथ बढ़ाया। रितिका उसके इतने करीब आ गई कि उसके गीले बाल निशांत के गाल से छू गए।
उसके कुर्ते का गला थोड़ा ढीला था। निशांत की नजर उसके क्लीवेज पर पड़ी और वहीं अटक गई। रितिका ने ये देखा और मुस्कुरा दी।
"देख लो," उसने धीरे से कहा, "कोई मना थोड़े ही कर रहा है।" निशांत ने झट से नजर हटा ली। उसका चेहरा लाल हो गया था।
उस रात रितिका ने दरवाजा खुला छोड़कर कपड़े बदले। निशांत बाथरूम जाते हुए गलियारे से गुजरा। शीशे में उसे रितिका की नंगी पीठ दिखी।
वो ठिठक गया। रितिका ने शीशे में उसकी परछाईं देखी। उसने जानबूझकर धीरे धीरे ब्रा का हुक लगाया। निशांत की सांसें तेज हो गईं।
अगली शाम किरण ने फोन किया। "सुनो, ऑफिस में ऑडिट चल रहा है। मैं आज लेट आऊंगी। तुम दोनों खाना खा लेना।"
शाम को सात बजे अचानक लाइट चली गई। पूरा मोहल्ला अंधेरे में डूब गया। रितिका ने मोमबत्ती जलाई। उसकी लौ में उसका चेहरा और भी खूबसूरत लग रहा था।
"पावर कट," उसने हंसते हुए कहा, "लगता है भगवान भी चाहता है कि आज कुछ हो।" निशांत ने उसे घूरा। "रितिका, ये मजाक नहीं है।"
"मजाक कौन कर रहा है," रितिका ने मोमबत्ती टेबल पर रखी और उसके सामने बैठ गई, "मैं तो कब से सीरियस हूं। तुम ही डरपोक बने हुए हो।"
बाहर बारिश की आवाज और अंदर मोमबत्ती की टिमटिमाती रोशनी। रितिका ने निशांत का हाथ पकड़कर अपने गाल पर रख लिया।
"छूकर देखो," उसने कहा, "मैं कोई शीशे की गुड़िया नहीं हूं।" निशांत की उंगलियां उसके गाल पर फिसलीं। उसकी त्वचा नरम और गर्म थी।
रितिका ने झुककर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। निशांत ने पहले तो हाथ हटाने की कोशिश की, पर फिर उसके होंठों का स्वाद उसे पागल कर गया।
उसने रितिका को खींचकर अपनी गोद में बैठा लिया। उसके हाथ रितिका की पीठ पर फिसलने लगे। रितिका ने उसके बालों में उंगलियां फंसा दीं।
किस लंबी और गहरी होती गई। रितिका की जीभ निशांत के मुंह में खेल रही थी। निशांत का लंड पैंट में तनकर दर्द करने लगा था।
रितिका ने ये महसूस किया। उसने हाथ नीचे बढ़ाकर पैंट के ऊपर से ही उसके लंड को पकड़ लिया। निशांत ने सिसकारी भरी।
"इतना बड़ा," रितिका ने हंसते हुए कहा, "दीदी तो लकी हैं।" निशांत ने उसके कुर्ते के बटन खोलने शुरू कर दिए।
एक एक बटन खुलता गया। रितिका की ब्रा में कैद बूब्स सामने आ गए। निशांत ने ब्रा के ऊपर से ही उन्हें दबाया। रितिका ने आंखें बंद करके होंठ काट लिए।
"और जोर से," उसने फुसफुसाया। निशांत ने ब्रा ऊपर सरकाई। उसके बूब्स आजाद हो गए। निप्पल तनकर खड़े थे।
निशांत ने एक निप्पल मुंह में ले लिया। चूसते हुए उसकी जीभ गोल गोल घूम रही थी। रितिका की उंगलियां उसके बालों में और गहरी धंस गईं।
"हां," वो सिसकी, "ऐसे ही।" निशांत का दूसरा हाथ उसके पेट से नीचे सरक रहा था। सलवार का नाड़ा खुलने को था।
तभी फोन बजा। किरण का नाम स्क्रीन पर चमक रहा था। दोनों की सांसें रुक गईं। निशांत ने फोन उठाया।
"हां बोलो," उसने सामान्य आवाज में कहा। "लाइट आई क्या," किरण ने पूछा, "मैं निकल रही हूं, एक घंटे में पहुंच जाऊंगी।"
फोन रखते ही दोनों अलग हुए। रितिका ने जल्दी से कुर्ता ठीक किया। उसकी आंखों में अधूरी प्यास साफ दिख रही थी।
"एक घंटा," उसने कहा, "अगली बार पूरा टाइम चाहिए मुझे।" निशांत ने कुछ नहीं कहा। पर उसके दिल में तूफान उठ चुका था।
किरण के आने के बाद रात सामान्य बीती। पर बिस्तर पर लेटे निशांत को नींद नहीं आई। रितिका के बूब्स का स्वाद उसके होंठों पर अब भी था।
फिर वो दिन आया जिसका रितिका को इंतजार था। किरण ने बताया कि उसे कानपुर ऑफिस के काम से रात भर बाहर रहना होगा।
"सुबह जल्दी निकल जाऊंगी," किरण ने कहा, "तुम दोनों अपना ख्याल रखना।" रितिका ने निशांत की तरफ देखा। उसकी आंखों में आग थी।
रात के नौ बजे रितिका बाहर आई। उसने गुलाबी नाइटी पहनी थी। निशांत की नजर उस पर पड़ी और वहीं जम गई।
"जीजू," उसने दरवाजे से टेक लगाकर कहा, "आज कोई फोन नहीं आएगा। कोई रुकावट नहीं। आज पूरी रात हमारी है।" निशांत उठ खड़ा हुआ।
वो रितिका के करीब गया। उसने उसके चेहरे को हाथों में लिया और होंठों पर टूट पड़ा। रितिका ने भी उसे कसकर पकड़ लिया।
दोनों बेडरूम में पहुंचे। निशांत ने दरवाजा बंद किया। रितिका ने उसकी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए। उसकी उंगलियां कांप रही थीं।
शर्ट उतरते ही रितिका ने उसकी छाती पर हाथ फेरा। फिर झुककर उसके निप्पल पर जीभ फेरी। निशांत ने उसके बाल पकड़ लिए।
उसका लंड बाहर निकल आया। तना हुआ, लंबा, नसें उभरी हुईं। रितिका ने उसे हाथ में पकड़ा। उसकी आंखें चमक उठीं।
"इतने दिनों से इसी का इंतजार था," उसने कहा और घुटनों पर बैठ गई। उसने लंड के टोपे पर जीभ फेरी। निशांत की कमर कांप गई।
रितिका ने धीरे धीरे पूरे लंड को मुंह में ले लिया। उसकी जीभ नीचे से ऊपर तक फिसल रही थी। निशांत ने दीवार का सहारा लिया।
निशांत ने उसे उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। उसने रितिका की नाइटी ऊपर सरकाई। नीचे उसने कुछ नहीं पहना था।
उसकी चूत सामने थी। गीली, फूली हुई। निशांत ने उंगली से उसे छुआ। रितिका ने करवट बदलने की कोशिश की।
"मत शर्माओ," निशांत ने कहा और झुककर उसकी चूत पर जीभ रख दी। रितिका की चीख निकल गई।
उसकी जीभ रितिका के दाने पर गोल गोल घूम रही थी। रितिका की टांगें कांप रही थीं। उसने चादर को मुट्ठियों में भींच लिया।
"जीजू," वो हांफते हुए बोली, "बस अब नहीं सहा जाता। अंदर डालो।" निशांत ने उंगली उसकी चूत में डाली। अंदर गीलापन भरा था।
उसने दो उंगलियां अंदर कीं। रितिका की कमर उठ गई। "हां," वो चिल्लाई, "और अंदर।" निशांत की उंगलियां तेज चलने लगीं।
रितिका का शरीर अकड़ गया। उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया। वो जोर से सिसकते हुए झड़ गई। उसका पूरा शरीर पसीने से भीग गया था।
निशांत ने अपने लंड को उसकी चूत के मुंह पर रखा। रितिका ने उसकी आंखों में देखा। "डालो," उसने कहा, "पूरा।"
निशांत ने धक्का दिया। उसका लंड धीरे धीरे अंदर सरकने लगा। रितिका की चूत टाइट थी। उसने निशांत की पीठ पर नाखून गड़ा दिए।
"आह," रितिका की आवाज निकली, "इतना बड़ा।" निशांत ने पूरा लंड अंदर कर दिया। दोनों की सांसें एक हो गईं।
फिर उसने धक्के लगाने शुरू किए। धीरे धीरे, फिर तेज। बिस्तर चरमराने लगा। रितिका की सिसकियां कमरे में गूंज रही थीं।
"और तेज," रितिका ने कहा, "फाड़ दो मुझे।" निशांत ने उसके बूब्स पकड़ लिए। धक्कों के साथ वो उन्हें मसल रहा था।
उसने रितिका की टांगें अपने कंधों पर रख लीं। अब लंड और गहरा जा रहा था। रितिका की आंखों से आंसू निकल आए।
"बस," वो बोली, "मैं फिर झड़ने वाली हूं।" निशांत ने रफ्तार बढ़ा दी। दोनों के शरीर पसीने से चिपक गए थे।
रितिका दूसरी बार झड़ी। उसकी चूत ने लंड को कसकर जकड़ लिया। निशांत ने लंड बाहर निकाला।
"मुंह में," रितिका ने कहा। निशांत ने लंड उसके मुंह में दे दिया। रितिका ने चूसा। निशांत का पानी उसके मुंह में छूट गया।
दोनों थोड़ी देर लेटे रहे। फिर रितिका ने करवट लेकर अपनी गांड उसकी तरफ कर दी। "अभी रात बाकी है," उसने कहा।
निशांत ने पीछे से उसे पकड़ लिया। उसका लंड फिर तन गया था। उसने रितिका की चूत में पीछे से लंड डाला।
डॉगी पोजीशन में धक्के और गहरे लग रहे थे। रितिका के बूब्स नीचे लटककर हिल रहे थे। निशांत ने हाथ बढ़ाकर उन्हें पकड़ लिया।
उसने रितिका के बाल पकड़कर खींचे। रितिका ने गर्दन मोड़कर उसे चूमा। दोनों की जीभें आपस में उलझ गईं।
"मैं आ रहा हूं," निशांत ने कहा। उसने लंड बाहर निकाला और रितिका की पीठ पर झड़ गया। सफेद धारें उसकी पीठ पर बह निकलीं।
दोनों बिस्तर पर गिर पड़े। रितिका निशांत की छाती पर सिर रखकर लेट गई। उसकी उंगली उसकी छाती पर गोल गोल घूम रही थी।
"जीजू," उसने धीरे से कहा, "ये एक महीना कभी खत्म न हो।" निशांत ने उसके माथे पर चूमा।
"आऊंगी," उसने कहा, "पर अगली बार दीदी को कानपुर नहीं, कहीं और भेजना। दो रात के लिए।" निशांत हंस पड़ा।
सुबह के पांच बजे अलार्म बजा। रितिका जल्दी से उठी। उसने नाइटी ठीक की और बिस्तर की चादर बदली।
निशांत ने उसे दरवाजे तक छोड़ा। रितिका ने उसके गाल पर चूमा। "आज कोचिंग में मेरा ध्यान नहीं लगेगा," उसने फुसफुसाया।
सुबह किरण का फोन आया। "पहुंच गई," उसने कहा, "तुम दोनों ने खाना खाया।" निशांत ने कहा, "हां, सब ठीक है।"
फोन रखते ही रितिका किचन से निकली। उसने चाय का कप निशांत की तरफ बढ़ाया। उसकी आंखों में वही पुरानी शरारत थी।
"जीजू," उसने धीमी आवाज में कहा, "आज शाम कोचिंग से जल्दी आ जाऊंगी। दरवाजा खुला रखना।"
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