हॉट हिंदी कहानी: छत की गर्मी
तुम ये hot hindi kahani सुनो, पहले दिन से ही कुछ अजीब था। छत पर हवा रुकी हुई थी, और दूसरी छत से एक औरत की आवाज़ आ रही थी, फोन पर, इतनी साफ़ कि कान बंद करना नामुमकिन था। मैं रमेश, चचेरे भाई की शादी में आया था, घर भर भरा था, इसलिए छत पर चारपाई डालकर सो रहा था।
उस औरत की आवाज़ ने मुझे जगा दिया था। "अरे कविता, तू समझती क्यों नहीं, ये रातें ना, कटती ही नहीं।" वो हँसी, हल्की और थोड़ी शरमाई हुई। "दुबई गए हुए आठ महीने हो गए उसे। आठ महीने। अब बता, औरत हूँ मैं, मशीन थोड़ी हूँ।"
मेरा सीना धड़कने लगा। पड़ोस की छत से आवाज़ आ रही थी, इतनी पास कि लग रहा था वो मेरे कान में बोल रही है। "हाँ, फोन पर बात होती है। पर फोन पर क्या... वो वाली बात हो सकती है क्या?" वो फिर हँसी, इस बार थोड़ी उदास। "मैं सच बोलूँ? रात को जब पंखा घूमता है ना, तो ऐसा लगता है कोई हाथ फेर रहा हो।"
मैं साँस रोककर सुनता रहा। शर्म भी आ रही थी और खून भी गरम हो रहा था। "अरे कल रात क्या हुआ, सुन। मैं सोने की कोशिश कर रही थी। पर ये गर्मी, ये अकेलापन। हाथ खुद ब खुद... नीचे चला गया। और फिर रुक ही नहीं पाया।" मेरी उँगलियाँ चारपाई की डोरी को मसलने लगीं।
"कविता, वो सोचती हूँ मैं, जब वो पास होता था तो कैसे... उफ़, कैसे करता था। पहले वो मेरे..." उसकी आवाज़ धीमी हो गई, फुसफुसाहट में बदल गई। "तू पूछ रही है क्या करता था? सब कुछ। वो मेरे بدن को... उफ़, मैं कैसे बताऊँ तुझे।" मेरा लंड पजामे में तनने लगा, बेकाबू।
तभी उसकी आवाज़ रुक गई। एक पल की खामोशी। फिर, "कविता, एक मिनट।" और फिर कदमों की आहट, मेरी छत की तरफ़ आती हुई। मेरी साँस अटक गई। पड़ोस की छत हमारी छत से सिर्फ़ एक नीची दीवार से अलग थी।
वो दीवार के पास आकर खड़ी हो गई। चाँद की रोशनी में उसका चेहरा दिखा, गोरी, उम्र तीस के आसपास, बाल खुले हुए, नाइटी पहने। "सुन रहे थे ना?" उसने सीधे पूछा, बिना घुमाए। मैं हकलाया, "वो... मैं... सोने की कोशिश..."
वो हँस पड़ी। "झूठ मत बोलो। आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी, मुझे पता है।" वो दीवार पर हाथ टिकाकर थोड़ा झुकी। उसकी नाइटी का गला थोड़ा खुला था, और चाँदनी में उसके boobs की लकीर साफ़ दिख रही थी। मेरी नज़र वहीं अटक गई।
"देखो भी लो, छिपाओ मत।" उसने कहा, और मेरी ओर देखा, आँखों में शरारत। "वैसे तुम हो कौन? शादी वाले घर से आए हो?" मैंने बताया, रमेश, दिल्ली से, चचेरे भाई की शादी। "मैं अनीता," उसने कहा। "बगल वाले घर की बहू। पति दुबई में।"
हम दोनों हँस पड़े, थोड़ी अजीब, थोड़ी गरम हँसी। "तो... कविता को क्या क्या बता रही थीं?" मैंने हिम्मत करके पूछा। अनीता ने भौंह उठाई। "सब सुन लिया तुमने। अब पूछ क्यों रहे हो?" वो दीवार के और पास आई। "या फिर... दोबारा सुनना चाहते हो, सीधे मुझसे?"
मेरा गला सूख गया। "अनीता जी, मैं..." "जी मत लगाओ," उसने कहा, और अपना हाथ दीवार के पार बढ़ाकर मेरी कलाई पकड़ ली। उसका हाथ गरम था, नरम। "रात बहुत लंबी है, रमेश। और तुम भी तो अकेले हो इस छत पर।"
उसने मुझे अपनी तरफ़ खींचा। दीवार नीची थी, मैं आसानी से उस पार कूद गया। उसकी छत पर एक चारपाई बिछी थी, चादर बिछी हुई। "बैठो," उसने कहा। मैं बैठ गया, दिल धड़कता हुआ। वो मेरे सामने खड़ी रही, चाँदनी उसके पीछे।
"तुमने सुना ना, मैं क्या कह रही थी कविता से।" उसकी आवाज़ अब धीमी, गहरी। "सच है वो सब। आठ महीने से कोई मर्द... मुझे छुआ तक नहीं।" वो मेरे पास बैठ गई, इतनी पास कि उसकी जाँघ मेरी जाँघ से छू गई। नाइटी पतली थी, उसकी गर्मी सीधे महसूस हो रही थी।
"और तुम?" उसने पूछा, मेरी आँखों में देखते हुए। "तुम्हारी... कोई है?" मैंने सिर हिलाया, नहीं। "तो हम दोनों ही... भूखे हैं।" उसने मेरा हाथ उठाया और अपने गाल पर रख दिया। उसका गाल गरम, नरम। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं।
फिर उसने कुछ ऐसा किया जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी। उसने मेरा हाथ अपने गाल से हटाया और सीधे अपने boobs पर रख दिया। नाइटी के ऊपर से, नरम, भारी, गरम। "दबाओ," उसने फुसफुसाया। "डरो मत।" मैंने धीरे से दबाया, और उसके मुँह से एक सिसकी निकली, "हाँ... ऐसे ही।"
मैंने हिम्मत बढ़ाई, दोनों हाथों से उसके boobs को नाइटी के ऊपर से मसलने लगा। वो आँखें बंद करके सिसकने लगी। "उफ़... रमेश... बहुत दिन हो गए... किसी ने ऐसे छुआ हो।" उसकी नाइटी का गला मैंने नीचे खींचा, और उसके नंगे boobs चाँदनी में चमक उठे, बड़े, गोल, निप्पल तने हुए।
मैंने अपना मुँह उसके एक निप्पल पर लगाया और चूसने लगा। "आह... हाँ..." वो मेरे बालों में उँगलियाँ फँसाकर मेरा सिर दबाने लगी। मैंने दूसरे हाथ से दूसरा boob मसलना जारी रखा, निप्पल को उँगलियों में मरोड़ते हुए। उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
"रुको," उसने कहा, और खड़ी हो गई। मेरी आँखों के सामने उसने अपनी नाइटी ऊपर उठाई और उतार फेंकी। चाँदनी में वो पूरी नंगी खड़ी थी, गोरी चमकती देह, boobs भारी, कमर पतली, और नीचे... उसकी chut के बाल काले, घने। मेरा लंड पजामे में फटने को था।
"अब तुम्हारी बारी," उसने कहा, और मेरे पास आकर मेरा कुर्ता उतारने लगी। फिर पजामे का नाड़ा खोला। पजामा नीचे गिरा, और मेरा लंड तना हुआ बाहर निकला, लंबा, मोटा, नसें उभरी हुईं। अनीता ने उसे देखा और होंठ चाटे। "उफ़... कितना... बड़ा है।"
उसने घुटनों के बल बैठकर मेरा लंड अपने हाथ में लिया। उसका हाथ नरम, गरम। उसने धीरे से हिलाना शुरू किया, ऊपर नीचे, और मेरी आँखें बंद हो गईं। "अनीता... उफ़..." फिर उसने अपना मुँह खोला और मेरे लंड के टोपे को अपने होंठों में ले लिया।
उसकी जीभ मेरे टोपे पर घूमने लगी, गोल गोल, और फिर उसने पूरा लंड मुँह में लेना शुरू किया, अंदर बाहर, गले तक। "उफ़... बहुत... बढ़िया..." मैं उसके बाल पकड़कर सिसकने लगा। उसने मेरे अंडकोष भी हाथ में लिए और सहलाने लगी। मेरा पूरा بدن काँप रहा था।
"बस... बस... नहीं तो..." मैंने कहा, क्योंकि मेरा pani nikalne वाला था। उसने मुँह हटाया, मुस्कुराई। "अभी नहीं। अभी तो बहुत कुछ बाकी है।" वो उठी और चारपाई पर लेट गई, टाँगें फैलाकर। "आओ। अब मेरी बारी।"
मैं उसके ऊपर आया। उसने मेरी कमर पकड़कर मुझे नीचे खींचा। मेरा लंड उसकी chut के मुँह पर था, गीला, गरम। "डालो... अंदर... धीरे से..." उसने कहा। मैंने धक्का दिया, और मेरा लंड उसकी गीली chut में धँसता चला गया, पूरा, जड़ तक। हम दोनों ने एक साथ सिसकी भरी।
"आह... कितना... भरा भरा लग रहा है..." अनीता ने मेरी पीठ को नाखूनों से खरोंचा। मैंने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किए, अंदर बाहर, गहरे। उसकी chut मेरे लंड को कसकर पकड़ रही थी, गीली, गरम, फिसलन भरी। "हाँ... ऐसे ही... और तेज़..."
मैंने रफ़्तार बढ़ाई। चारपाई चरमराने लगी। उसके boobs हर धक्के के साथ उछल रहे थे। मैंने झुककर एक निप्पल मुँह में लिया और चूसते हुए धक्के लगाता रहा। "उफ़... रमेश... मैं... मैं..." उसकी टाँगें मेरी कमर से लिपट गईं।
"जھड़ रही हूँ... आह..." वो चिल्लाई, और उसकी chut मेरे लंड के इर्द गिर्द सिकुड़ने लगी, लहरों की तरह। उसका पूरा بدن काँपा, नाखून मेरी पीठ में धँस गए। मैंने धक्के जारी रखे, उसे पूरा मज़ा देते हुए, जब तक वो शांत नहीं हुई।
वो हाँफ रही थी, पसीने में भीगी। "उफ़... आठ महीने बाद... कोई..." उसने मेरी ओर देखा, आँखों में प्यास अभी बाकी। "रुको मत। अभी तुम बाकी हो।" उसने मुझे पलटा, अब वो ऊपर थी। मेरा लंड अभी भी तना हुआ, उसकी chut से गीला।
वो मेरे ऊपर बैठी और मेरा लंड अपनी chut में खुद डाला, धीरे से नीचे बैठते हुए। "आह..." वो ऊपर नीचे होने लगी, पहले धीरे, फिर तेज़। उसके boobs मेरे चेहरे के सामने उछल रहे थे। मैंने दोनों हाथों से उन्हें पकड़ा और मसलने लगा।
"हाँ... ऐसे... दबाओ उन्हें... उफ़..." वो तेज़ होती गई। उसकी chut मेरे लंड पर फिसल रही थी, आवाज़ें आ रही थीं, गीली, चटपटी। मैंने नीचे से भी धक्के लगाने शुरू किए, ताल मिलाकर। "अनीता... मैं... आने वाला हूँ..."
तभी उसने कुछ ऐसा किया। वो रुकी, मेरे ऊपर से उठी, और मेरा लंड मुँह में ले लिया, तेज़ी से चूसने लगी। "अनीता... उफ़..." मेरा pani nikalne वाला था, बेकाबू। और तभी, एक झटके के साथ, मेरा वीर्य निकला, उसके मुँह में, धार धार।
उसने सब निगल लिया, एक बूंद भी नहीं गिराई, और फिर मेरे लंड को चाटकर साफ़ किया। "उफ़... कितना... गरम..." वो मेरे बगल में लेट गई, हाँफती हुई। हम दोनों चाँदनी में नंगे लेटे थे, पसीने में भीगे, दिल धड़कते हुए।
कुछ देर खामोशी रही, सिर्फ़ हमारी साँसों की आवाज़। फिर अनीता बोली, "कविता को कल बताऊँगी... कि आज रात फोन वाली बात... सच हो गई।" मैं हँस पड़ा। उसने मेरा हाथ पकड़ा। "चलो," उसने कहा, उठते हुए। "अब मेरे कमरे में। नीचे कोई नहीं है। सास सो रही हैं।"
हम दबे पाँव नीचे उतरे, उसके कमरे में। उसने दरवाज़ा बंद किया, कुंडी लगाई। कमरे में हल्की रोशनी थी। वो बिस्तर पर लेट गई, टाँगें फैलाकर, मुझे इशारे से बुलाते हुए। "एक बार और," उसने कहा, आँखों में शरारत। "इस बार... पीछे से।"
मेरा लंड फिर तनने लगा था, उसकी बात सुनकर। मैं बिस्तर पर आया, उसने करवट ली, घुटनों के बल हुई, कमर झुकाकर। उसकी गोरी कमर, गोल चूतड़ मेरे सामने। मैंने पीछे से उसकी chut में उँगली डाली, गीली, गरम। वो सिसकी।
"डालो ना... तड़पाओ मत..." उसने कहा। मैंने अपना लंड उसकी chut के मुँह पर रखा और एक ज़ोरदार धक्के में अंदर डाल दिया, जड़ तक। "आह... हाँ..." वो आगे को झुकी। मैंने उसकी कमर पकड़ी और धक्के लगाने शुरू किए, तेज़, गहरे।
उसके चूतड़ मेरे पेट से टकरा रहे थे, थप थप की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। मैंने झुककर उसके boobs पकड़ लिए, लटकते हुए, और मसलते हुए धक्के लगाता रहा। "उफ़... रमेश... बहुत... अंदर तक..." उसकी chut मेरे लंड को निचोड़ रही थी।
"मैं फिर... जھड़ रही..." वो चिल्लाई, और उसका بدن काँपा, ज़ोर से। उसकी chut की लहरों ने मेरे लंड को जकड़ लिया, और मैं भी नहीं रुक पाया। "अनीता..." मैंने आखिरी गहरे धक्के के साथ अपना सारा वीर्य उसकी chut में छोड़ दिया, भर दिया उसे।
हम बिस्तर पर ढेर हो गए, एक दूसरे से लिपटे। उसकी साँसें मेरी छाती पर गरम लग रही थीं। "तुम... तुम तो..." वो हँसी, थकी हुई, खुश। "कविता ने सही कहा था। किस्मत वालों को... छत पर... ऐसे पड़ोसी मिलते हैं।"
मैंने उसके माथे को चूमा। "शादी में तीन दिन और हूँ," मैंने कहा। उसने मेरी आँखों में देखा, मुस्कुराई, और फुसफुसाई, "तो तीनों रातें... छत पर... मेरी चारपाई पर। और हाँ..." वो रुकी, मेरे कान में बोली, "कल रात... कविता को फोन मत करना। वो रात... सिर्फ़ हमारी है।"
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