देहाती सेक्स कहानी: ढाबे वाली रात
"सुनील जी," कविता ने चाय का कप उसके सामने रखते हुए आँख मारकर कहा, "आज की रात तो किसी देहाती सेक्स कहानी जैसी होने वाली है, देख लेना।"
सुनील ने कप उठाया और हँस दिया। दोपहर के तीन बजे थे और उसका ट्रक ढाबे के सामने धूल उड़ाता खड़ा था। क्लच प्लेट जल गई थी, ये बात मैकेनिक ने फोन पर ही बता दी थी। मैकेनिक सुबह आएगा, पार्ट्स जयपुर से मँगाने पड़ेंगे। मतलब आज की रात यहीं कटेगी।
"मज़ाक कर रही हो, भाभी," सुनील ने कहा। "मेरी किस्मत में कहानियाँ नहीं, खराब ट्रक लिखे हैं।"
कविता हँसी। चौंतीस साल की उम्र, गेहुआँ रंग, और वो हँसी जो ढाबे के हर ट्रक ड्राइवर को एक बार तो रोक ही लेती थी। उसका पति रमेश कल सुबह ही अपने भाई के गाँव गया था, किसी ज़मीनी झगड़े के पंचायत फैसले के लिए। दो दिन बाद लौटेगा।
"कहानियाँ किस्मत से नहीं, हिम्मत से बनती हैं," कविता ने कहा और अंदर चली गई। सुनील उसे जाता देखता रहा। सलवार के ऊपर का कुर्ता कसा हुआ था और चलने के अंदाज़ में कुछ ऐसा था जो दोपहर की गर्मी को और बढ़ा रहा था।
शाम के चार बजे कविता थाली लेकर आई। दाल, रोटी, प्याज़ और हरी मिर्च। "खाना खा लो। रात को ढाबा आठ बजे बंद हो जाता है, उसके बाद जो चाहिए खुद बनाना पड़ेगा।"
"रात को रुकने की जगह?" सुनील ने पूछा।
"पीछे कोठरी है। चारपाई, पंखा, कंबल। ड्राइवर लोग अक्सर रुकते हैं।" कविता ने थाली रखी और बोली, "खा लो, फिर कोठरी दिखा देती हूँ।"
खाना खाते हुए सुनील की नज़र बार-बार कविता पर जा रही थी। वो बर्तन माँज रही थी, झुकी हुई, और कुर्ता पीठ पर चिपका हुआ था। सुनील ने नज़र हटाई, फिर फिर वहीं जा टिकी।
"क्या देख रहे हो?" कविता ने बिना पलटे पूछा।
"कुछ नहीं, भाभी।"
"झूठ मत बोलो। मर्द की नज़र मैं पहचानती हूँ।" वो पलटी और मुस्कुराई। "चलो, कोठरी देख लो।"
कोठरी ढाबे के पीछे थी। छोटी सी, साफ़ सुथरी। चारपाई पर दरी बिछी थी, कोने में पानी का घड़ा। कविता ने पंखा चलाया और बोली, "कंबल अलमारी में है। रात को ठंड बढ़ जाती है।"
वो अलमारी की तरफ बढ़ी। अलमारी ऊपर थी और कविता का हाथ नहीं पहुँच रहा था। "ज़रा ये बोरा हटाओगे? कंबल उसी के पीछे है।"
सुनील ने अनाज का बोरा उठाया। भारी था। जैसे ही उसने बोरा एक तरफ रखा, कविता कंबल निकालने के लिए उचकी और उसका बदन सुनील से टकरा गया। एक पल के लिए दोनों ठिठक गए।
कविता पीछे नहीं हटी। उसने धीरे से कहा, "बोरा तो हटा दिया। अब क्या हटाओगे?"
सुनील का दिल धड़कने लगा। उसने कविता की कमर पर हाथ रखा। कविता ने कोई विरोध नहीं किया। बल्कि वो और करीब आ गई, इतनी करीब कि उसकी साँसें सुनील के चेहरे पर महसूस हो रही थीं।
"रमेश जी दो दिन बाद आएँगे," कविता ने फुसफुसाकर कहा। "और इस कोठरी में दरवाज़े की कुंडी भी है।"
सुनील ने उसे अपनी तरफ खींचा और होंठों पर होंठ रख दिए। कविता ने पहले तो हल्का सा विरोध किया, फिर पूरी तरह समर्पण कर दिया। उसके होंठ नरम थे और जीभ में वो गर्मी थी जो सालों की प्यासी औरत में होती है।
सुनील के हाथ कविता की पीठ पर घूम रहे थे, फिर नीचे सरककर उसके कूल्हों पर आ गए। उसने दबोचा। कविता के मुँह से हल्की सी सिसकारी निकली। "धीरे," उसने कहा, "ढाबे में अभी ग्राहक हैं।"
"तो दरवाज़ा बंद कर दो," सुनील ने कहा।
कविता ने कुंडी लगाई और पलटकर सुनील को देखा। उसकी आँखों में शरारत थी। "तुम्हें पता है, मैंने आज तक किसी पराये मर्द को हाथ नहीं लगाने दिया।"
"और आज?"
"आज मन कर रहा है।" कविता ने अपना कुर्ता उतार दिया। अंदर उसने ब्लाउज़ पहना था, कसा हुआ। सुनील की नज़र उसके उभरे हुए सीने पर टिक गई।
सुनील ने आगे बढ़कर ब्लाउज़ के ऊपर से ही उसके बूब्स को हाथों में भर लिया। दबाया। कविता की साँसें तेज़ हो गईं। "हाँ," वो बोली, "ऐसे ही।"
सुनील ने ब्लाउज़ के बटन खोले। कविता के बूब्स आज़ाद हो गए, गोरे और भरे हुए। सुनील ने एक निप्पल मुँह में लिया और चूसने लगा। कविता ने उसके बालों में उँगलियाँ फँसा लीं और सिर को और दबा दिया।
"और ज़ोर से," वो फुसफुसाई।
सुनील का एक हाथ नीचे सरका। सलवार का नाड़ा खोला और हाथ अंदर डाल दिया। कविता की चूत गीली हो चुकी थी। उसने उँगली से छुआ तो कविता काँप गई।
"सुनील," उसने कहा, "आज तक रमेश ने भी मुझे ऐसे नहीं छुआ।"
सुनील ने दो उँगलियाँ अंदर डालीं और हिलाने लगा। कविता की कमर हिलने लगी। उसके मुँह से आवाज़ें निकल रही थीं जिन्हें वो दबाने की कोशिश कर रही थी।
तभी बाहर से आवाज़ आई, "भाभी, चाय!"
कविता ने जल्दी से कपड़े ठीक किए। "रुको," उसने सुनील से कहा, "रात को आऊँगी। कंबल लेकर।" वो मुस्कुराकर बाहर चली गई।
सुनील चारपाई पर लेट गया। उसका लंड पैंट में तना हुआ था। उसने सोचा, ये रात लंबी होने वाली है।
शाम ढलने लगी। ढाबे में दो चार ट्रक ड्राइवर आए, खाना खाया और चले गए। सुनील बाहर चारपाई पर बैठा बीड़ी पीता रहा, पर उसकी नज़र बार-बार रसोई की तरफ जा रही थी जहाँ कविता काम कर रही थी। जब भी उनकी आँखें मिलतीं, कविता हल्के से मुस्कुरा देती। उस मुस्कान में वादा था।
सुनील ने सोचा, इतने सालों से वो दिल्ली से जयपुर का रास्ता नाप रहा है। सैकड़ों ढाबों पर रुका है। पर आज जैसा एहसास कभी नहीं हुआ। कविता में कुछ अलग था। भूख थी, पर शर्म भी। हिम्मत थी, पर डर भी। यही कशिश उसे पागल कर रही थी।
रात के आठ बजे ढाबा बंद हो गया। आखिरी ग्राहक चला गया। कविता ने दरवाज़ा बंद किया और ताला लगाया। फिर वो कोठरी की तरफ आई, हाथ में कंबल लिए।
सुनील चारपाई पर बैठा था। कविता ने अंदर आकर दरवाज़े की कुंडी लगाई और कंबल चारपाई पर फेंक दिया।
"कंबल तो बहाना था," सुनील ने कहा।
"तुम समझदार हो," कविता ने कहा और अपनी सलवार का नाड़ा खोल दिया। सलवार नीचे सरक गई। अब वो सिर्फ कुर्ते में थी, नीचे कुछ नहीं।
सुनील ने उसे खींचकर चारपाई पर गिरा दिया। कुर्ता ऊपर उठाया। कविता की नंगी टाँगें, गीली चूत, सब उसके सामने था। सुनील ने अपनी शर्ट उतारी, पैंट उतारी। उसका लंड पूरी तरह तना हुआ था।
कविता ने उसे देखा और होंठों पर जीभ फेरी। "इतना बड़ा," उसने कहा, "रमेश का तो आधा भी नहीं।"
सुनील ने उसे लिटाया और उसके ऊपर आ गया। पहले उसने कविता के बूब्स को जी भरकर चूसा, निप्पलों को दाँतों से हल्के से काटा। कविता तड़प रही थी।
"अब तड़पाओ मत," कविता ने कहा। "डाल दो।"
सुनील ने अपना लंड उसकी चूत पर रखा और धीरे से धकेला। कविता की चूत टाइट थी, गीली थी। लंड धीरे धीरे अंदर गया। कविता ने आँखें बंद कर लीं और लंबी साँस ली।
"हाँ," वो बोली, "पूरा डाल दो।"
सुनील ने पूरा लंड अंदर कर दिया और हिलने लगा। धीरे धीरे, फिर तेज़। चारपाई चरमराने लगी। कविता ने अपनी टाँगें उसकी कमर के गिर्द लपेट लीं।
"और तेज़," कविता ने कहा। "मुझे आज पूरी औरत बनाओ।"
सुनील ने रफ़्तार बढ़ा दी। उसका लंड कविता की चूत में अंदर बाहर हो रहा था। कविता की आवाज़ें बढ़ रही थीं। उसने सुनील की पीठ पर नाखून गड़ा दिए।
"मैं झड़ने वाली हूँ," कविता ने कहा।
"रुको," सुनील ने कहा। उसने लंड बाहर निकाला और कविता को पलट दिया। अब वो घोड़ी बनी हुई थी। सुनील ने पीछे से लंड डाला।
इस पोज़ में लंड और गहरा गया। कविता चिल्ला उठी। "हाँ, ऐसे ही। मारो मुझे।"
सुनील ने उसके कूल्हों को पकड़कर ज़ोर ज़ोर से धक्के मारे। कविता का बदन हिल रहा था, बूब्स झूल रहे थे। कुछ ही देर में कविता का बदन अकड़ गया और वो ज़ोर से झड़ गई। उसकी चूत ने लंड को भींच लिया।
सुनील ने उसे सीधा किया और फिर से मिशनरी में डाल दिया। अब वो अपने चरम के करीब था। उसने तेज़ी से धक्के मारे और फिर कविता के अंदर ही झड़ गया। गर्म वीर्य की धार उसकी चूत में उतर गई।
दोनों हाँफ रहे थे। पसीने से तर। कविता ने सुनील को अपनी बाहों में भर लिया।
"तुमने आज मुझे जन्नत दिखा दी," कविता ने कहा।
"रमेश जी से प्यार नहीं करतीं?" सुनील ने पूछा।
कविता ने लंबी साँस ली। "प्यार तो करती हूँ। पर वो महीने में बीस दिन बाहर रहते हैं, माल ढोते हैं। और जब घर आते हैं तो थके होते हैं। औरत हूँ, सुनील। मुझे भी कभी कभी किसी का छूना चाहिए।"
सुनील ने उसके माथे पर चूमा। "आज की रात तुम्हारी है।"
"अभी रात बाकी है," सुनील ने कहा।
आधी रात को कविता फिर जागी। सुनील सो रहा था। उसने सुनील के लंड को हाथ में लिया और सहलाने लगी। लंड फिर तन गया।
कविता ने उसे मुँह में ले लिया। चूसने लगी। सुनील की आँख खुल गई।
"क्या कर रही हो?" उसने पूछा।
"दूसरी पारी की तैयारी," कविता ने मुस्कुराकर कहा।
इस बार कविता ऊपर आई। वो सुनील के लंड पर बैठ गई और खुद हिलने लगी। उसके बूब्स उछल रहे थे। सुनील ने उन्हें हाथों में पकड़ लिया और निप्पलों को मसलने लगा।
कविता की रफ़्तार बढ़ती गई। वो खुद अपनी चूत को लंड पर रगड़ रही थी। "मैं फिर झड़ रही हूँ," वो बोली।
सुनील ने नीचे से धक्के मारने शुरू कर दिए। दोनों की रफ़्तार मिल गई। कविता ज़ोर से चीखी और झड़ गई। उसके बाद सुनील ने उसे नीचे लिटाया और खुद ऊपर आकर कुछ ही धक्कों में दोबारा झड़ गया।
सुबह के चार बजे थे। कविता उठी, कपड़े पहने और बोली, "सो जाओ। सुबह चाय लेकर आऊँगी।"
सुनील ने उसका हाथ पकड़ा और खींचकर अपने पास बिठा लिया। "इतनी जल्दी जा रही हो? थोड़ी देर और रुको।"
"रुकूँगी तो फँस जाऊँगी," कविता ने हँसकर कहा। "मुझे तुम्हारी आदत पड़ रही है, सुनील। ये ठीक नहीं।"
"आदतें तो बनने के लिए होती हैं," सुनील ने कहा।
कविता ने उसके गाल थपथपाए। "पगले।" फिर वो उठी और दरवाज़े की तरफ बढ़ी। चौखट पर रुककर पलटी।
"कविता," सुनील ने उसे आवाज़ दी।
"हम्म?"
"अगली बार ट्रक खराब हो या न हो, मैं यहीं रुकूँगा।"
कविता मुस्कुराई, उसके गाल पर एक चुम्मा दिया और बोली, "ट्रक खराब करना मत भूलना।"
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