हिंदी अंतरवासना कहानी: दिल्ली में कविता और विक्रम की रात
“विक्रम, तुम सच में आज रात यहीं रुक रहे हो ना, या फिर होटल का बहाना बनाकर भाग जाओगे।” कविता ने दरवाज़ा खोलते ही मुस्कुराकर कहा और उसकी आँखों में सीधे देखा। विक्रम हँसा और बोला, “कविता, तुम्हारे हाथ का खाना छोड़कर होटल का खाना कौन खाएगा, मैं तो बस तुम्हारी इजाज़त का इंतज़ार कर रहा था।” यह हिंदी अंतरवासना कहानी उसी एक मुस्कान से शुरू हुई थी।
कविता तैंतीस साल की थी और दिल्ली में एक छोटा सा बुटीक चलाती थी। उसके पति काम के सिलसिले में बाहर गए हुए थे और घर में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी।
विक्रम सैंतीस साल का था, उसके पति का कॉलेज का दोस्त, और दिल्ली में किसी काम से आया हुआ था। उसने नीली शर्ट पहनी थी, उसकी आस्तीनें कोहनी तक मुड़ी हुई थीं और उसकी हँसी में वही पुराना बेफिक्र अंदाज़ था। कविता ने उसे अंदर बुलाया और कहा कि खाना अभी बन रहा है, तब तक वह ड्रॉइंग रूम में बैठ जाए।
ड्रॉइंग रूम में हल्की रोशनी थी और खिड़की से बाहर दिल्ली की शाम की आवाज़ें आ रही थीं। कविता ने दो गिलास में ठंडा नींबू पानी दिया और खुद उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। बातचीत कॉलेज के दिनों से शुरू हुई, फिर बुटीक के काम पर आ गई, फिर धीरे धीरे ज़िंदगी की थकान पर।
“तुम्हारा बुटीक कैसा चल रहा है।” विक्रम ने पूछा और कविता की ओर झुककर उसकी बात ध्यान से सुनने लगा। कविता ने बताया कि काम अच्छा है, पर शाम को घर लौटकर अकेलापन उसे खा जाता है। उसकी आवाज़ में एक हल्की सी उदासी थी जिसे विक्रम ने तुरंत पकड़ लिया।
कविता ने जानबूझकर अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा ढीला छोड़ दिया था और जब वह उठकर रसोई की ओर गई तो उसकी चाल में एक जानबूझकर लाई गई लचक थी। विक्रम की नज़र उसके कूल्हों पर ठहर गई और उसने खुद को संभालते हुए गिलास उठा लिया। कविता ने पीछे मुड़कर देखा और मुस्कुरा दी, जैसे वह सब कुछ समझ गई हो।
खाना तैयार हुआ तो दोनों डाइनिंग टेबल पर बैठ गए। कविता ने दाल, सब्ज़ी, रोटी और सलाद परोसा और विक्रम ने हर चीज़ की तारीफ़ की। बातचीत में हँसी आ गई, पुराने किस्से खुल गए और दोनों के बीच की औपचारिकता धीरे धीरे पिघलने लगी।
“तुम्हें याद है कॉलेज में तुम कितने शरारती थे।” कविता ने हँसते हुए कहा और विक्रम की ओर चम्मच उठाकर इशारा किया। विक्रम बोला, “और तुम कितनी सख्त बनती थीं, पर तुम्हारी आँखें हमेशा सब बता देती थीं।” दोनों हँस पड़े और उस हँसी में एक नई गर्मजोशी थी।
कविता ने धीरे से कहा, “विक्रम, सच बताओ, क्या तुम्हें भी यह शाम कुछ अलग लग रही है।” विक्रम ने उसकी आँखों में देखा और बोला, “कविता, मैं झूठ नहीं बोलूँगा, तुम्हारे पास आते ही मुझे कुछ अलग महसूस हुआ था।” कविता का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
उसने अपना हाथ बढ़ाकर विक्रम का हाथ पकड़ लिया। विक्रम ने उसका हाथ अपने हाथ में कसकर थाम लिया और उसकी उँगलियों को सहलाने लगा। कविता ने उसकी ओर कदम बढ़ाया और दोनों के बीच की दूरी खत्म हो गई। विक्रम ने धीरे से उसके गाल को छुआ।
“कविता, तुम जानती हो यह सही है या गलत।” विक्रम ने फुसफुसाकर पूछा। कविता बोली, “मैं जानती हूँ कि मैं क्या चाहती हूँ, और आज रात मैं वही चाहती हूँ जो मेरा दिल कह रहा है।” विक्रम ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए और एक लंबा, गर्म चुंबन शुरू हो गया।
चुंबन धीरे धीरे गहरा होता गया। कविता ने विक्रम की गर्दन में अपनी बाँहें डाल दीं और उसकी जीभ से खेलने लगी। विक्रम ने उसकी कमर को पकड़कर उसे अपने करीब खींच लिया। दोनों की साँसें तेज़ हो गईं और बालकनी की ठंडी हवा भी उनकी गर्मी को कम नहीं कर पाई।
कविता ने विक्रम का हाथ पकड़ा और उसे अंदर बेडरूम की ओर ले गई। बेडरूम में हल्की पीली रोशनी जल रही थी और बिस्तर पर साफ चादर बिछी थी। कविता ने दरवाज़ा बंद किया और विक्रम की ओर मुड़कर मुस्कुराई। उसकी आँखों में अब कोई झिझक नहीं थी।
विक्रम ने कविता की साड़ी का पल्लू धीरे से उसके कंधे से सरकाया। कविता ने उसकी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए और उसकी छाती पर अपने होंठ रख दिए। विक्रम ने उसके ब्लाउज़ की डोरी खोली और उसकी पीठ को सहलाने लगा। दोनों के शरीर एक दूसरे से सट गए।
कविता ने अपनी साड़ी नीचे सरकने दी और ब्लाउज़ उतार दिया। विक्रम ने उसकी ब्रा का हुक खोला और उसके बड़े, मुलायम बूब्स को अपने हाथों में भर लिया। वह उन्हें धीरे धीरे दबाने लगा और कविता के मुँह से हल्की सी सिसकारी निकल गई। कविता ने उसके कान में फुसफुसाकर कहा कि और ज़ोर से करो।
विक्रम ने उसके एक निप्पल को अपने मुँह में लिया और चूसने लगा। कविता ने उसके बालों में उँगलियाँ फिराईं और अपना सिर पीछे झुका दिया। उसकी साँसें तेज़ हो गईं और वह विक्रम के सिर को अपने सीने से और सटा रही थी। विक्रम दूसरे बूब को हाथ से मसलते हुए चूसता रहा।
कविता ने विक्रम की पैंट की ज़िप खोली और उसका कड़ा लंड बाहर निकाल लिया। वह उसे अपने हाथ में पकड़कर धीरे धीरे हिलाने लगी। विक्रम ने आँखें बंद कर लीं और उसके होंठों से एक गहरी आह निकली। कविता ने उसकी ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहा कि उसे यह बहुत पसंद आ रहा है।
फिर कविता घुटनों के बल बैठ गई और विक्रम के लंड को अपने मुँह में ले लिया। वह उसे धीरे धीरे चूस रही थी, उसकी जीभ उसके ऊपर घूम रही थी और विक्रम उसके बालों को सहला रहा था। कविता ने उसे गहराई तक लिया और फिर धीरे से बाहर निकाला, बार बार यही करती रही। विक्रम की टाँगें काँपने लगीं।
विक्रम ने कविता को उठाया और उसे बिस्तर पर लिटा दिया। उसने उसकी पेटीकोट की डोरी खोली और उसे नीचे सरका दिया। कविता की पैंटी गीली हो चुकी थी और विक्रम ने उसे भी धीरे से उतार दिया। अब कविता पूरी तरह नंगी उसके सामने थी और उसकी चूत गीली चमक रही थी।
विक्रम ने उसकी टाँगें फैलाईं और उसकी चूत को अपने मुँह से चाटने लगा। उसकी जीभ उसकी चूत के ऊपर नीचे घूम रही थी और कविता बिस्तर पर छटपटा रही थी। वह उसके बाल पकड़कर उसे और करीब खींच रही थी और बोल रही थी कि मत रुको। उसकी चूत से पानी निकलने लगा और विक्रम उसे चाटता रहा।
कविता की सिसकारियाँ पूरे कमरे में गूँज रही थीं। वह बोली, “विक्रम, अब और मत तड़पाओ, अंदर डालो।” विक्रम ने अपना लंड उसकी चूत के मुँह पर रखा और धीरे से अंदर धकेला। कविता ने एक लंबी आह भरी और विक्रम को अपनी बाँहों में कसकर जकड़ लिया।
विक्रम ने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किए। पहले धीरे, फिर तेज़, फिर और तेज़। कविता की चूत उसके लंड को कसकर जकड़ रही थी और हर धक्के पर उसके मुँह से आह निकल रही थी। विक्रम ने उसकी कमर पकड़ ली और उसे और गहराई तक पेलने लगा।
कविता ने अपनी टाँगें उसकी कमर पर लपेट दीं और हर धक्के का जवाब अपनी कमर उठाकर देने लगी। दोनों की चुदाई अब पूरी रफ्तार पर थी और बिस्तर की चरमराहट उनकी आवाज़ों में मिल रही थी। कविता बोली, “हाँ, ऐसे ही, और ज़ोर से, मुझे पूरा चाहिए।”
विक्रम ने रफ्तार बढ़ा दी और कविता का शरीर उसके नीचे हिलने लगा। उसकी चूत से पानी बह रहा था और विक्रम का लंड उस गीलापन में आसानी से अंदर बाहर हो रहा था। कविता की आँखें बंद थीं और वह सिर्फ विक्रम के धक्कों को महसूस कर रही थी।
अचानक कविता का शरीर काँपने लगा और वह ज़ोर से चिल्ला उठी। उसकी चूत ने विक्रम के लंड को कसकर जकड़ लिया और वह झड़ गई। उसका पानी विक्रम के लंड पर बह गया और वह हाँफते हुए बिस्तर पर पसर गई। विक्रम ने रुककर उसे चूमा।
थोड़ी देर बाद विक्रम ने कविता को घुटनों के बल किया और पीछे से उसकी चूत में अपना लंड डाल दिया। वह उसे पीछे से पेलने लगा और कविता अपने हाथों पर टिककर हर धक्का ले रही थी। विक्रम ने उसके बूब्स को पीछे से पकड़ लिया और उन्हें दबाते हुए धक्के लगाता रहा।
कविता की आवाज़ अब और खुल गई थी। वह बोल रही थी, “विक्रम, तुम्हारा लंड मुझे बहुत अच्छा लग रहा है, मत रुको।” विक्रम ने उसकी कमर को पकड़कर और तेज़ धक्के लगाए। उसकी चूत की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी और दोनों पसीने से भीग गए थे।
विक्रम का शरीर भी अब चरम पर पहुँच रहा था। उसने कुछ और तेज़ धक्के लगाए और फिर ज़ोर से आह भरते हुए कविता की चूत के अंदर ही झड़ गया। उसका गर्म पानी अंदर बह गया और कविता ने महसूस किया कि वह भी दोबारा झड़ने के करीब है। विक्रम उसके ऊपर लेट गया।
दोनों हाँफते हुए एक दूसरे से लिपटे रहे। कविता ने विक्रम के माथे पर चूमा और बोली, “यह रात मैं कभी नहीं भूलूँगी।” विक्रम बोला, “मैं भी नहीं, कविता, तुमने आज मुझे कुछ ऐसा दिया जो मैं बरसों से चाहता था।” दोनों मुस्कुरा दिए।
कविता बोली, “विक्रम, रात अभी बाकी है, क्या तुम पास के होटल में मेरे साथ एक और रात बिताना चाहोगे।” विक्रम हँसा और बोला, “तुम जहाँ कहोगी, मैं वहीं चलूँगा।” दोनों ने कपड़े पहने और रात के साढ़े ग्यारह बजे घर से निकल पड़े।
पास का होटल ज़्यादा दूर नहीं था। रिसेप्शन पर विक्रम ने कमरा लिया और दोनों लिफ्ट से ऊपर गए। कमरे में पहुँचते ही कविता ने विक्रम को दीवार से सटा लिया और फिर से चूमने लगी। उसकी इच्छा अभी खत्म नहीं हुई थी और विक्रम भी यही चाहता था।
होटल के बिस्तर पर कविता ने विक्रम के कपड़े खुद उतारे। वह उसके लंड को फिर से हाथ में लेकर हिलाने लगी और फिर उसे चूसने लगी। विक्रम ने उसकी नाइटी उतार दी और उसके बूब्स को चूसने लगा। दोनों फिर से एक दूसरे में डूब गए।
इस बार कविता विक्रम के ऊपर बैठ गई। उसने उसके लंड को अपनी चूत में खुद डाला और ऊपर नीचे होने लगी। विक्रम ने उसकी कमर पकड़ ली और नीचे से धक्के लगाने लगा। कविता की सिसकारियाँ और तेज़ हो गईं और वह बोली कि उसे यह पोज़िशन सबसे ज़्यादा पसंद है।
कविता ऊपर से तेज़ी से हिल रही थी और विक्रम नीचे से उसे पेल रहा था। दोनों की साँसें फूल गई थीं और कमरे में सिर्फ उनकी आवाज़ें गूँज रही थीं। कविता ने विक्रम के सीने पर हाथ टिकाए और अपनी कमर को गोल गोल घुमाते हुए उसे अंदर ले रही थी।
विक्रम ने अचानक कविता को पलट दिया और उसे फिर से नीचे लिटाकर पेलने लगा। इस बार धक्के और गहरे थे और कविता हर धक्के पर उछल रही थी। वह बोली, “हाँ विक्रम, ऐसे ही, मुझे पूरा भर दो।” विक्रम ने उसकी बात मानकर रफ्तार और बढ़ा दी।
कविता दोबारा झड़ गई और उसकी चूत ने विक्रम के लंड को कस लिया। विक्रम ने भी कुछ धक्कों बाद उसके अंदर झड़ते हुए आह भरी। दोनों थककर एक दूसरे से लिपट गए और होटल की चादर में एक दूसरे की गर्मी महसूस करने लगे।
रात के दो बजे दोनों बालकनी में खड़े होकर दिल्ली की रोशनियों को देख रहे थे। कविता ने विक्रम का हाथ थामा और बोली, “तुम कल भी यहीं रहोगे ना।” विक्रम ने उसके हाथ को चूमा और बोला, “कल भी, और जब तक तुम कहोगी, तब तक।”
कविता मुस्कुराई और विक्रम के कंधे पर सिर रख दिया। उसने धीरे से कहा, “तो फिर कल रात भी यही कहानी दोहराते हैं।” विक्रम हँसा और उसके होंठों पर एक हल्का सा चुंबन दिया। दिल्ली की रात उनके ऊपर चुपचाप फैली हुई थी।
अगली दोपहर कविता अपने बुटीक में बैठी हुई थी और नए कपड़ों की अलमारी जमा रही थी। तभी पीछे के दरवाज़े से विक्रम अंदर आया और बोला कि वह सिर्फ एक बार उसे देखे बिना नहीं रह पाया। कविता ने मुस्कुराकर स्टोररूम का दरवाज़ा खोला और उसे अंदर बुला लिया।
स्टोररूम में कपड़ों की खुशबू फैली हुई थी और हल्की सी धूप खिड़की से आ रही थी। विक्रम ने दरवाज़ा बंद किया और कविता को अपने करीब खींच लिया। कविता ने उसकी गर्दन में बाँहें डाल दीं और उसके होंठों को चूमने लगी। दोनों की साँसें फिर से तेज़ होने लगीं।
कविता ने विक्रम की शर्ट के बटन खोले और उसकी छाती पर अपने हाथ फिराने लगी। विक्रम ने उसकी कुर्ती ऊपर उठाई और उसकी कमर को सहलाने लगा। कविता ने उसके कान में फुसफुसाकर कहा कि यहाँ कोई नहीं आएगा, इसलिए वह बेफिक्र रहे। विक्रम मुस्कुरा दिया।
विक्रम ने कविता के बूब्स को कुर्ती के ऊपर से ही दबाना शुरू किया और कविता की सिसकारी निकल गई। उसने कुर्ती उतार दी और ब्रा का हुक खोलकर उसके बूब्स को आज़ाद कर दिया। विक्रम ने एक निप्पल को मुँह में लिया और चूसने लगा, जबकि दूसरा हाथ से मसलता रहा।
कविता ने विक्रम की पैंट खोली और उसका कड़ा लंड बाहर निकालकर हिलाने लगी। विक्रम ने उसकी सलवार की डोरी खोली और उसे नीचे सरका दिया। कविता की पैंटी उतारते ही उसकी गीली चूत सामने आ गई और विक्रम ने उसे अपनी उँगलियों से सहलाना शुरू कर दिया।
कविता ने एक पुरानी मेज़ का सहारा लिया और अपनी टाँगें फैला दीं। विक्रम ने उसकी चूत को चाटना शुरू किया और उसकी जीभ अंदर तक घूमने लगी। कविता ने उसके बाल पकड़ लिए और बोली कि वह और तेज़ करे। उसका पानी निकलने लगा और विक्रम उसे चाटता रहा।
फिर विक्रम ने अपना लंड उसकी चूत के मुँह पर रखा और एक ही झटके में अंदर डाल दिया। कविता ने एक लंबी आह भरी और मेज़ को कसकर पकड़ लिया। विक्रम ने तेज़ धक्के लगाने शुरू किए और कविता हर धक्के पर उछल रही थी। स्टोररूम में उनकी आवाज़ें गूँज रही थीं।
कविता बोली कि वह झड़ने वाली है और विक्रम ने रफ्तार और बढ़ा दी। कुछ ही धक्कों में कविता का शरीर काँप उठा और वह झड़ गई। विक्रम ने भी उसके अंदर झड़ते हुए उसे कसकर पकड़ लिया। दोनों हाँफते हुए एक दूसरे से लिपट गए।
कविता ने कपड़े ठीक किए और हँसते हुए बोली कि अब वह काम पर लौटे, वरना ग्राहक इंतज़ार करेंगे। विक्रम ने उसके माथे पर चूमा और बोला कि यह दोपहर वह कभी नहीं भूलेगा। दोनों मुस्कुराते हुए स्टोररूम से बाहर आ गए।
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