हिंदी चुदाई की कहानी: किराए के घर की डायरी
कविता ने पुराना गद्दा पलटा ही था कि उसके नीचे से एक कपड़े की जिल्द वाली डायरी सरककर बाहर आ गई, और उसके पहले पन्ने पर घुंघराले अक्षरों में लिखा था: मेरी रातें, एक सच्ची हिंदी चुदाई की कहानी।
रविवार की सुबह थी। लखनऊ के अलीगंज में किराए का ये दो कमरों वाला फ्लैट आज ही मिला था, और सामान अभी आधा ही उतरा था। रमेश पर्दे की छड़ें लेने बाजार गया था, मजदूर नीचे ट्रक खाली कर रहे थे, और कविता अकेली कमरे में बिस्तर जमा रही थी।
उसने डायरी उठाई। जिल्द पर धूल जमी थी, पर पन्ने संभालकर रखे गए थे। पहला पन्ना पलटते ही उसकी सांस थम गई। तीन साल पुरानी तारीख, और नीचे लिखा था: आज पहली बार मैंने अपने शरीर को सच में जाना।
कविता के हाथ कांपने लगे। उसने दरवाजा अंदर से बंद किया और पलंग पर बैठ गई। ये डायरी पिछली किरायेदार की थी, इसमें कोई शक नहीं था। मकान मालिक ने बताया था कि इससे पहले यहां एक अकेली औरत रहती थी, शालिनी नाम था शायद।
दूसरे पन्ने पर शालिनी ने अपने प्रेमी का जिक्र किया था। लिखा था कि वो रात को ग्यारह बजे आता था, सीढ़ियों से दबे पांव, और दरवाजा बंद होते ही उसके होंठ शालिनी की गर्दन पर होते थे। कविता की गर्दन पर जैसे किसी ने उंगली फेर दी।
उसने पढ़ना जारी रखा। शालिनी ने हर छोटी बात लिखी थी। कैसे उसका प्रेमी उसकी साड़ी का पल्लू धीरे धीरे खींचता था, कैसे उसके ब्लाउज के हुक एक एक करके खुलते थे, और कैसे वो उसके कानों में फुसफुसाता था कि आज रात वो उसे सोने नहीं देगा।
कविता की जांघें अपने आप सिकुड़ गईं। उसकी शादी को छह साल हो गए थे, पर रमेश के साथ अब वो बात नहीं रही थी जो शुरू में थी। बच्चे की चाहत, घर का खर्च, ऑफिस की थकान, इन सबके बीच बिस्तर की गर्मी कहीं खो गई थी।
तभी नीचे से मजदूर की आवाज आई। कविता ने जल्दी से डायरी अपने थैले में छिपाई और दरवाजा खोल दिया। उसका चेहरा लाल था, और दिल इतनी जोर से धड़क रहा था जैसे उसने कोई चोरी की हो।
दोपहर का खाना दोनों ने जमीन पर बैठकर खाया। रमेश बिस्तर की बात कर रहा था, पर्दों की बात कर रहा था, पर कविता का ध्यान डायरी पर था। थैले में रखी वो डायरी जैसे उसे बुला रही थी।
खाना खाकर रमेश सो गया। ट्रक चला गया था, मजदूर चले गए थे, और फ्लैट में पहली बार खामोशी छा गई। कविता ने धीरे से थैला खोला और डायरी निकाली। उसका हाथ पसीने से गीला था।
अगले पन्नों पर शालिनी ने एक रात का पूरा ब्योरा लिखा था। उसका प्रेमी उस रात जल्दी आ गया था। शालिनी बाथरूम से नहाकर निकली थी, बदन पर सिर्फ तौलिया लपेटे। उसने लिखा था: उसने मुझे दीवार से लगा दिया, तौलिया खींचकर फेंक दिया, और मेरे गीले बदन को ऐसे चूमा जैसे वो कोई मीठा फल हो।
कविता की सांसें तेज हो गईं। उसने अनजाने में अपनी साड़ी का पल्लू ढीला कर दिया। कमरे में रमेश सो रहा था, पर कविता का बदन अब किसी और ही दुनिया में था।
शालिनी ने लिखा था कि उसके प्रेमी ने उसे पलंग पर लिटाया और उसके पैरों से शुरू किया। उंगलियां, फिर होंठ, फिर जीभ, धीरे धीरे ऊपर की ओर। जब वो उसकी जांघों के बीच पहुंचा, तो शालिनी ने तकिया मुंह में दबा लिया था ताकि आवाज बाहर न जाए।
कविता ने डायरी एक तरफ रखी और अपनी आंखें बंद कर लीं। उसका हाथ अपने आप उसकी साड़ी के अंदर चला गया। उसने खुद को छुआ, पहले धीरे, फिर तेज। शालिनी के शब्द उसके कानों में गूंज रहे थे।
उसकी उंगलियां उसके सबसे नाजुक हिस्से पर थीं। उसने अपने होंठ काट लिए ताकि आवाज न निकले। रमेश बगल के कमरे में सो रहा था, और यहां कविता अपने ही हाथों में पिघल रही थी।
जब वो झड़ी, तो उसकी पूरी देह कांप गई। उसने तकिया कसकर पकड़ लिया। कई महीनों बाद उसने ऐसा सुकून महसूस किया था। उसने डायरी उठाई और आगे पढ़ने लगी, पर अब उसके मन में एक और ही ख्याल था।
शाम को रमेश बाजार से सब्जी लेकर आया। कविता ने खाना बनाया, पर उसकी नजरें बार बार रमेश पर जा रही थीं। उसने आज रमेश को एक नई नजर से देखा। उसकी चौड़ी छाती, उसकी मजबूत बाहें, उसकी दाढ़ी में छिपी मुस्कान।
खाना खाते वक्त कविता ने धीरे से कहा, आज नई जगह है, नई शुरुआत करते हैं। रमेश ने हैरानी से देखा, फिर मुस्कुराया। उसकी आंखों में वो पुरानी चमक लौट आई जो कविता ने सालों से नहीं देखी थी।
रात को दस बजे कविता बाथरूम में गई। उसने जानबूझकर शालिनी वाली तरकीब अपनाई। वो बाहर निकली तो उसके बदन पर सिर्फ एक तौलिया था, बालों से पानी टपक रहा था। रमेश पलंग पर लेटा फोन देख रहा था।
फोन रख दो, कविता ने कहा। उसकी आवाज में एक ऐसा आदेश था जो रमेश ने पहले कभी नहीं सुना था। रमेश ने फोन एक तरफ रखा और उसे देखने लगा। उसकी नजरें उसके गीले कंधों से फिसलकर तौलिए की गांठ पर टिक गईं।
कविता धीरे धीरे पलंग की ओर बढ़ी। उसने रमेश का हाथ पकड़ा और अपने गीले बालों पर रख दिया। पानी की बूंदें उसकी उंगलियों पर गिरीं। रमेश ने उसे खींचकर अपने पास बिठा लिया।
उसने तौलिए की गांठ खोली। तौलिया सरककर नीचे गिर गया। रमेश की सांस थम गई। छह साल की शादी में उसने कविता को कितनी बार देखा था, पर आज वो उसे पहली बार देख रहा था।
तुम आज कुछ अलग लग रही हो, रमेश ने फुसफुसाते हुए कहा। कविता ने जवाब में उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। ये चुम्बन लंबा था, गहरा था, और इसमें भूख थी।
रमेश ने उसे पलंग पर लिटा दिया। उसने उसके पैरों से शुरुआत की, बिल्कुल वैसे जैसे डायरी में लिखा था। उसकी उंगलियां उसके टखनों पर, फिर पिंडलियों पर, फिर जांघों पर। कविता की देह में झुरझुरी दौड़ गई।
जब उसके होंठ उसकी जांघों के अंदरूनी हिस्से पर पहुंचे, तो कविता ने चादर मुट्ठी में भींच ली। रमेश ने उसकी चूत को चूमा, पहले हल्के से, फिर जीभ से। कविता की कमर अपने आप उठ गई।
और, उसने सिसकते हुए कहा। रमेश ने उसकी बात मानी। उसकी जीभ ने उसे वो सुकून दिया जो वो महीनों से तरस रही थी। कविता की आवाजें कमरे में गूंजने लगीं, और उसे इस बात की परवाह नहीं थी कि पड़ोसी सुन रहे हैं या नहीं।
फिर कविता ने करवट बदली और रमेश को लिटा दिया। उसने उसकी बनियान उतारी, फिर उसका पजामा। उसका लंड तना हुआ था, नसें उभरी हुईं। कविता ने उसे हाथ में लिया और धीरे से सहलाया।
उसने उसे मुंह में लिया। रमेश ने उसके बाल पकड़ लिए। कविता ने डायरी वाली तरकीब याद की, जीभ का वो घुमाव जो शालिनी ने लिखा था। रमेश की जांघें कांपने लगीं।
बस, अब और नहीं, रमेश ने हांफते हुए कहा। उसने कविता को खींचकर ऊपर किया और उसके अंदर समा गया। दोनों ने एक साथ सिसकी भरी। इतना गहरा मिलन, इतने महीनों बाद।
रमेश ने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किए। कविता ने अपनी टांगें उसकी कमर में लपेट दीं। हर धक्के के साथ पलंग चरमराया। कविता ने उसके कंधों पर नाखून गड़ा दिए।
फिर रमेश ने उसे घुमाया। कविता अब उसके ऊपर थी। उसने अपनी रफ्तार खुद तय की, ऊपर नीचे, आगे पीछे। उसके स्तन उछल रहे थे, और रमेश ने उन्हें हाथों में भर लिया।
दोनों का पसीना एक हो गया। कमरे में सिर्फ उनकी सांसों की आवाज थी। कविता ने रफ्तार बढ़ाई। उसे लगा जैसे उसके अंदर कोई बांध टूटने वाला है।
और फिर वो आई। कविता की चीख उसके गले में ही घुट गई। उसकी देह ऐंठी, फिर ढीली पड़ गई। रमेश ने उसे कसकर पकड़ा और खुद भी झड़ गया, उसके अंदर, गहराई तक।
दोनों हांफते हुए लेटे रहे। रमेश ने कविता के माथे पर चूमा। आज तुमने मुझे छह साल पीछे पहुंचा दिया, उसने कहा। कविता मुस्कुराई। उसके मन में डायरी थी, पर उसने कुछ नहीं कहा।
आधी रात को कविता की आंख खुली। रमेश सो रहा था। उसने तकिए के नीचे से डायरी निकाली। अब वो इसे छिपाकर नहीं, खुलेआम पढ़ना चाहती थी। उसने एक पन्ना रमेश को सुनाने का फैसला किया।
सुनो, उसने रमेश को जगाते हुए कहा। रमेश ने आंखें मलीं। कविता ने डायरी खोली और पढ़ने लगी: उस रात उसने मुझे खिड़की के पास खड़ा किया, शहर की बत्तियां नीचे थीं, और उसने पीछे से मुझे अपनी बाहों में भर लिया।
रमेश की नींद उड़ गई। कविता पढ़ती रही: उसने मेरी नाइटी ऊपर की, और वहीं खिड़की के पास, उसने मुझे लिया। मुझे डर था कि कोई देख लेगा, पर उसी डर ने मजा दोगुना कर दिया था।
रमेश उठकर बैठ गया। उसका लंड फिर तनने लगा था। कविता ने डायरी बंद की और उसे देखा। खिड़की, उसने सिर्फ इतना कहा।
दोनों खिड़की के पास गए। नीचे गली में स्ट्रीट लाइट जल रही थी। रमेश ने पीछे से कविता को पकड़ा। उसकी नाइटी ऊपर हुई। कविता ने खिड़की की ग्रिल पकड़ ली।
रमेश उसके अंदर समाया, पीछे से। कविता ने होंठ काट लिए। हर धक्के के साथ उसकी चूत में आग लग रही थी। नीचे गली में कोई रिक्शा गुजरा, पर उन्हें कोई परवाह नहीं थी।
इस बार जल्दी हुआ, पर उतना ही गहरा। दोनों एक साथ झड़े। कविता ग्रिल पकड़े हांफती रही। रमेश ने उसे गोद में उठाया और पलंग तक लाया।
ये डायरी कहां से आई, रमेश ने पूछा। कविता ने मुस्कुराकर कहा, गद्दे के नीचे से। पिछली किरायेदार की है। रमेश हंसा। तो हमें उसका शुक्रिया अदा करना चाहिए।
सुबह कविता जल्दी उठी। रमेश सो रहा था। उसने डायरी खोली और आखिरी खाली पन्ने पर लिखना शुरू किया। उसके अक्षर घुंघराले नहीं थे, पर सच्चे थे।
उसने लिखा: आज मैंने इस डायरी को पढ़ा, और अपनी शादी को फिर से जिया। जो भी ये डायरी अगली बार पाए, उसके लिए एक सलाह। शर्म को गद्दे के नीचे दबा दो, और अपनी रातों को खुलकर जियो। कविता।
उसने डायरी बंद की और उसे वापस गद्दे के नीचे रख दिया, ठीक वहीं जहां उसे मिली थी। रमेश की आंख खुली। उसने कविता को देखकर पूछा, क्या मुस्कुरा रही हो।
कविता ने उसके पास आकर उसके होंठों पर एक हल्का चुम्बन दिया और कहा, कुछ नहीं, बस एक हिंदी चुदाई की कहानी पढ़ ली, और उसे जी भी लिया।
डायरी का आखिरी पन्ना। तारीख तीन साल पुरानी। शालिनी ने लिखा था: आज इस घर में मेरी आखिरी रात है। कल मैं ये शहर छोड़ दूंगी। और आज रात, मैं इस घर को एक आखिरी तोहफा देना चाहती हूं।
वो रात को दस बजे आया था। हमेशा की तरह दबे पांव, सीढ़ियों से। शालिनी ने दरवाजा खोला तो वो हैरान रह गया। कमरे में मोमबत्तियां जल रही थीं। बिस्तर पर नई चादर। शालिनी ने लाल साड़ी पहनी थी।
उसने शालिनी को देखा, ऊपर से नीचे तक। लाल साड़ी में वो किसी दुल्हन जैसी लग रही थी। शालिनी ने उसका हाथ पकड़ा और बिस्तर पर बिठाया। आज कोई जल्दी नहीं, उसने कहा। आज रात बहुत लंबी है।
शालिनी ने उसके सामने धीरे धीरे नृत्य किया। साड़ी का पल्लू हवा में लहराया। फिर एक झटके में उसने पल्लू गिरा दिया। उसका ब्लाउज, उसकी चोली, सब एक एक करके फर्श पर।
वो उसके सामने नंगी खड़ी थी। मोमबत्ती की रोशनी में उसका बदन सोने जैसा चमक रहा था। उसने उसे बिस्तर पर लिटाया और उसके ऊपर आ गई। आज मैं तुम्हें वैसे प्यार करूंगी, जैसे पहली बार किया था, उसने कहा।
आज आखिरी बार, शालिनी ने कहा। उसकी आंखों में आंसू थे, पर होंठों पर मुस्कान। उसने उसे बिस्तर पर बिठाया और उसके सामने घुटनों पर बैठ गई।
उसने उसकी पैंट खोली। उसका लंड पहले से तना था। शालिनी ने उसे मुंह में लिया, धीरे धीरे, प्यार से। जैसे वो इस लम्हे को हमेशा के लिए याद रखना चाहती हो।
फिर वो उठी और अपनी साड़ी उतार दी। लाल साड़ी फर्श पर फैल गई। वो नंगी खड़ी थी, मोमबत्तियों की रोशनी में। उसने उसका हाथ पकड़ा और अपने स्तनों पर रखा।
दोनों बिस्तर पर लेट गए। उसने उसे अपने ऊपर खींचा। जब वो उसके अंदर समाया, तो शालिनी ने उसे कसकर पकड़ लिया। जैसे वो उसे कभी छोड़ना न चाहती हो।
उस रात उन्होंने हर पोजीशन आजमाई। हर कोना, हर दीवार। शालिनी ने लिखा: मैंने उसे अपने शरीर के हर हिस्से में महसूस किया। मेरी चूत, मेरे स्तन, मेरी गर्दन, हर जगह उसके निशान।
सुबह चार बजे वो गया। जाते वक्त उसने शालिनी के माथे पर चूमा। शालिनी ने दरवाजा बंद किया और डायरी में लिखा: ये घर मेरी गवाह है। मेरी रातों की, मेरे प्यार की। जो भी यहां अगली बार रहे, उसे मेरी शुभकामनाएं।
और नीचे, आखिरी लाइन: अलविदा, मेरे घर। अलविदा, मेरी रातें।
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