हिंदी XXX कहानी: चाबी वाली छत
यह हिंदी XXX कहानी जयपुर की एक पुरानी लाइब्रेरी से शुरू होती है, जहाँ सुनिता शर्मा लौटी हुई किताबों को अलमारी में लगा रही थी और एक मोटी सी जिल्द वाली किताब के पन्नों के बीच उसे एक छोटा सा लिफाफा मिला। लिफाफे के अंदर एक पीतल की चाबी थी और एक मुड़ा हुआ कागज था, जिस पर साफ अक्षरों में लिखा था कि जो इस चाबी को ढूँढे, वह रात नौ बजे छत वाले कमरे में आए। सुनिता की उँगलियाँ काँप गईं, क्योंकि लाइब्रेरी की छत वाला कमरा बरसों से बंद पड़ा था और उसकी चाबी किसी के पास नहीं थी।
सुनिता पैंतीस साल की थी, जयपुर की उसी लाइब्रेरी में सहायक के तौर पर काम करती थी, और उसका पति दिल्ली में नौकरी के कारण हफ्तों बाहर रहता था। घर में अकेलापन उसकी आदत बन चुका था, मगर उस दिन लिफाफे ने उसके सीने में एक अजीब सी गर्मी जगा दी। उसने चाबी को हथेली में कसकर बंद किया, चारों तरफ देखा कि कोई देख तो नहीं रहा, और लिफाफा अपनी साड़ी के पल्लू में छिपा लिया। उसकी साँसें तेज हो गई थीं और वह बार बार सोच रही थी कि यह नोट किसने लिखा होगा।
शाम को लाइब्रेरी बंद होने से पहले सुनिता ने छत की सीढ़ियों की तरफ नजर डाली, जहाँ धूल जमी हुई थी और एक पुराना ताला लटका हुआ था। ताले पर जंग लगी थी, मगर वह ताला ठीक वैसा ही दिखता था जैसी चाबी उसके पास थी। उसके मन में डर भी था और एक ऐसी चाहत भी थी जो उसने बरसों से अपने अंदर दबा रखी थी। उसने तय कर लिया कि वह रात नौ बजे वहाँ जाएगी, चाहे जो हो।
रात नौ बजे सुनिता ने चुपचाप सीढ़ियाँ चढ़ीं, और चाबी ताले में डालते ही ताला एक हल्की सी आवाज के साथ खुल गया। कमरे के अंदर एक धीमा बल्ब जल रहा था, पुरानी अलमारियाँ थीं, और एक कोने में किताबों की जिल्दें बाँधने वाला कबीर खड़ा था। कबीर छत्तीस साल का था, लाइब्रेरी में पुरानी किताबों की मरम्मत करता था, और उसकी आँखें सुनिता को देखकर बिल्कुल शांत थीं, जैसे वह जानता हो कि वह जरूर आएगी।
कबीर ने धीरे से कहा कि नोट उसी ने लिखा था, क्योंकि वह महीनों से सुनिता को किताबें लगाते हुए देखता आ रहा था और उसकी चाल, उसकी हँसी, उसके हाथों की नरमी उसे हर दिन खींचती थी। सुनिता ने पहले उसे डाँटने की कोशिश की, मगर उसकी आवाज काँप रही थी और उसके गाल लाल हो गए थे। कबीर ने एक कदम आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ा और कहा कि अगर वह चाहे तो वह अभी लौट सकती है, मगर सुनिता ने अपना हाथ नहीं छुड़ाया।
कबीर ने सुनिता को दीवार से लगाया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए, और सुनिता ने भी उसी गर्मी से जवाब दिया जैसे बरसों की प्यास एक पल में खुल गई हो। उसने सुनिता की साड़ी का पल्लू धीरे से हटाया, उसके ब्लाउज के बटन खोले, और उसके बड़े नरम उरोजों को अपने हाथों में भरकर सहलाने लगा। सुनिता की साँसें तेज हो गईं, उसने कबीर की कमीज पकड़कर खींची और उसकी छाती पर अपने नाखून गड़ा दिए।
कबीर ने सुनिता के उरोजों को मुँह में लेकर चूसा, उसकी जीभ उसके निप्पलों पर घूम रही थी, और सुनिता की कमर अपने आप उसकी तरफ झुक रही थी। उसने सुनिता की साड़ी नीचे सरकाई, उसकी पेटीकोट की डोरी खोली, और उसकी चूत को अपनी उँगलियों से छूकर देखा कि वह पूरी तरह गीली हो चुकी थी। सुनिता ने उसके कान में फुसफुसाकर कहा कि अब और मत तड़पाओ, और कबीर ने मुस्कुराकर उसकी चूत में अपनी दो उँगलियाँ डाल दीं।
सुनिता की टाँगें काँप रही थीं, उसकी चूत से पानी बह रहा था, और वह कबीर के कंधे पर सिर रखकर सिसक रही थी। कबीर ने अपनी पैंट उतारी, उसका लंबा मोटा लंड बाहर निकाला, और सुनिता की चूत के मुँह पर उसे रगड़ने लगा। सुनिता ने खुद अपनी टाँगें फैलाईं और कहा कि डाल दो, और कबीर ने एक ही झटके में अपना लंड उसकी गीली चूत में उतार दिया। सुनिता की चीख उसके गले में ही दब गई, क्योंकि कबीर ने उसके होंठों को अपने होंठों से बंद कर दिया था।
कबीर ने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किए, फिर तेज किए, और हर धक्के के साथ सुनिता की चूत से गीलेपन की आवाज आ रही थी। सुनिता ने उसकी पीठ को पकड़ा, अपनी कमर उछाली, और दोनों के शरीर एक ताल में हिल रहे थे। थोड़ी देर में सुनिता का शरीर अकड़ गया, उसकी चूत ने कबीर के लंड को कसकर जकड़ लिया, और वह झड़ गई। कबीर ने उसे और तेज चोदा, फिर अपना सारा पानी उसकी चूत के अंदर छोड़ दिया, और दोनों पसीने में भीगे हुए एक दूसरे से लिपट गए।
अगले दिन लाइब्रेरी में सुनिता का मन काम में नहीं लग रहा था, और उसकी आँखें बार बार नीचे किताब बाँधने वाले कमरे की तरफ जा रही थीं। दोपहर को उसने एक किताब के अंदर एक छोटा सा नोट छिपाया, जिस पर लिखा था कि आज बंद होने के बाद किताब बाँधने वाला कमरा। कबीर ने वह नोट पढ़ा और शाम को जब लाइब्रेरी बंद हुई, तो वह कमरे में उसका इंतजार कर रहा था। सुनिता ने दरवाजा अंदर से बंद किया और सीधे उसके पास जाकर उसकी कमीज के बटन खोलने लगी।
इस बार सुनिता ने पहल की, उसने कबीर को एक पुरानी मेज पर बैठाया और उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई। उसने उसका लंड मुँह में लिया, धीरे धीरे चूसा, उसकी जीभ लंड के सिरे पर घूम रही थी, और कबीर उसके बालों को पकड़कर सिसक रहा था। जब कबीर का लंड पूरी तरह सख्त हो गया, तो सुनिता मेज पर चढ़ गई, अपनी साड़ी ऊपर उठाई, और खुद उसके लंड पर बैठ गई। उसने अपनी चूत में लंड उतारा और ऊपर नीचे होने लगी, उसके उरोज हवा में हिल रहे थे।
कबीर ने उसके उरोजों को पकड़ा, उन्हें दबाया, और नीचे से धक्के लगाने लगा। सुनिता की सिसकियाँ कमरे में गूँज रही थीं, उसकी चूत से पानी टपक रहा था, और वह तेज तेज उछल रही थी। फिर कबीर ने उसे पलटकर मेज पर झुकाया, पीछे से उसकी चूत में लंड डाला, और कुत्ते वाली पोजीशन में उसे जोर जोर से चोदने लगा। सुनिता की उँगलियाँ मेज के किनारे को कसकर पकड़े थीं, और वह बार बार कह रही थी कि और तेज, और तेज। दोनों एक साथ झड़े, कबीर का पानी उसकी चूत में भर गया, और सुनिता हाँफते हुए उसकी छाती से लग गई।
उस रात सुनिता घर लौटी तो उसका पति दिल्ली से फोन पर बात कर रहा था, मगर सुनिता का मन कबीर की बाँहों में ही अटका था। अगले दिन कबीर एक किताब लौटाने के बहाने उसके घर आया, जब घर में कोई नहीं था। सुनिता ने दरवाजा खोला, उसे अंदर खींचा, और सीधे बेडरूम में ले गई। उसने उसकी कमीज उतारी, उसकी छाती को चूमा, और बिस्तर पर उसे लिटाकर उसकी टाँगों के बीच बैठ गई।
सुनिता ने कबीर का लंड फिर मुँह में लिया, उसे पूरी तरह गीला किया, फिर खुद लेट गई और अपनी टाँगें फैला दीं। कबीर उसके ऊपर आया, अपना लंड उसकी चूत में डाला, और मिशनरी पोजीशन में उसे धीरे धीरे चोदने लगा। सुनिता ने अपनी टाँगें उसकी कमर पर लपेट लीं, उसके होंठों को चूमा, और हर धक्के के साथ उसकी सिसकी बढ़ रही थी। कबीर ने उसकी चूत में गहराई तक धक्के लगाए, उसके उरोजों को चूसा, और दोनों के शरीर पसीने से चिपक गए।
सुनिता ने कबीर से कहा कि वह उसकी चूत को और जोर से चोदे, और कबीर ने उसकी बात मानकर धक्कों की रफ्तार बढ़ा दी। बिस्तर चरमरा रहा था, सुनिता की चूत से पानी बह रहा था, और वह अपनी कमर उछाल उछालकर उसका साथ दे रही थी। आखिर में सुनिता का शरीर अकड़ गया, वह जोर से झड़ गई, और उसके झड़ते ही कबीर ने भी अपना पानी उसकी चूत के अंदर छोड़ दिया। दोनों हाँफते हुए बिस्तर पर पड़े रहे, और सुनिता ने उसकी छाती पर सिर रखकर कहा कि अब यह खेल हर हफ्ते होगा।
अगले दिन लाइब्रेरी में कबीर ने एक किताब के पन्नों के बीच सुनिता के लिए एक छोटा सा नोट छिपा दिया, जिस पर लिखा था कि आज रात छत वाला कमरा, वही वक्त। सुनिता ने नोट पढ़ते ही किताब को अपनी छाती से लगा लिया, और उसका चेहरा लाल हो गया। वह दिन भर किताबें लगाती रही, मगर उसके मन में रात की तस्वीरें घूम रही थीं, और वह बार बार घड़ी देख रही थी।
रात नौ बजे छत वाले कमरे में कबीर ने सुनिता को दीवार से लगाया, उसकी साड़ी ऊपर उठाई, और उसे वहीं खड़े खड़े पीछे से पकड़ लिया। उसने अपनी पैंट नीचे की, अपना लंड उसकी चूत के मुँह पर रखा, और धीरे से अंदर डाल दिया। सुनिता ने दीवार को पकड़ा, अपनी कमर पीछे धकेली, और कबीर के हर धक्के के साथ उसकी सिसकी बढ़ रही थी। थोड़ी देर में दोनों की साँसें तेज हो गईं, सुनिता की चूत ने उसका लंड कसकर जकड़ लिया, और वह झड़ गई। कबीर ने दो तीन जोर के धक्के और लगाए, फिर अपना पानी उसकी चूत में छोड़ दिया, और दोनों दीवार से लगे हुए हाँफ रहे थे।
सुनिता ने अपनी साड़ी ठीक की, कबीर के गाल को चूमा, और कहा कि अब यह चाबी हमेशा उसके पास रहेगी, ताकि कोई भी रात छत वाला कमरा खाली न रहे। कबीर ने हँसकर कहा कि चाबी तो बहाना थी, असली ताला तो सुनिता के दिल पर लगा था, जो अब खुल चुका है। सुनिता ने उसकी बात पर हँसते हुए उसका हाथ पकड़ लिया, और दोनों सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थे।
शाम को जब कबीर जाने लगा, तो सुनिता ने पीतल की चाबी उसकी हथेली पर रखी और कहा कि कल फिर, इसी वक्त, छत वाला कमरा। कबीर ने चाबी को अपनी मुट्ठी में बंद किया, उसके माथे को चूमा, और दरवाजे से बाहर निकल गया। सुनिता दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थी, और उसके हाथ में अब भी उसकी उँगलियों की गर्मी बाकी थी।
रविवार की सुबह लाइब्रेरी बंद थी, मगर सुनिता के पास छत वाले कमरे की चाबी थी, और कबीर ने उसे सुबह ही एक किताब के अंदर नोट भेजा था कि आज छत वाला कमरा सिर्फ उनका होगा। सुनिता ने हल्की सी साड़ी पहनी, लाइब्रेरी के पीछे वाले दरवाजे से अंदर गई, और सीढ़ियाँ चढ़कर छत वाले कमरे में पहुँची, जहाँ कबीर पहले से उसका इंतजार कर रहा था। कमरे में बारिश की बूँदें खिड़की से आ रही थीं, और कबीर ने सुनिता को देखते ही उसे अपनी बाँहों में भर लिया।
कबीर ने सुनिता की साड़ी का पल्लू हटाया, उसके ब्लाउज के बटन खोले, और उसके उरोजों को मुँह में लेकर चूसने लगा। सुनिता ने उसकी कमीज पकड़ी, उसे नीचे खींचा, और उसकी छाती पर अपने होंठ रख दिए। कबीर ने उसकी साड़ी नीचे सरकाई, उसकी चूत को उँगलियों से सहलाया, और जब वह पूरी तरह गीली हो गई, तो उसने अपना लंड उसकी चूत में डाल दिया। सुनिता ने दीवार का सहारा लिया, अपनी कमर हिलाई, और दोनों की साँसें कमरे में गूँजने लगीं।
थोड़ी देर बाद कबीर ने सुनिता को एक पुरानी मेज पर बैठाया, उसकी टाँगें फैलाईं, और फिर से उसकी चूत में धक्के लगाने लगा। सुनिता के उरोज हवा में हिल रहे थे, कबीर उन्हें पकड़कर दबा रहा था, और सुनिता की सिसकियाँ बढ़ रही थीं। जब सुनिता झड़ गई, तो कबीर ने उसे पलटकर पीछे से चोदा, उसके बाल पकड़े, और जोर जोर से धक्के लगाए। दोनों एक साथ झड़े, कबीर का पानी उसकी चूत में भर गया, और सुनिता हाँफते हुए उसकी छाती से लग गई।
बारिश थमने के बाद सुनिता ने अपनी साड़ी ठीक की, कबीर के माथे को चूमा, और कहा कि अब हर रविवार की सुबह इसी कमरे की होगी। कबीर ने चाबी उसकी हथेली पर रखी, उसके हाथ को चूमा, और कहा कि यह चाबी अब सिर्फ सुनिता की है। सुनिता मुस्कुराते हुए सीढ़ियों से नीचे उतरी, और उसके कदमों में एक नई हल्कापन था।
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