जीजा साली सेक्स कहानी हिंदी: लखनऊ की तपती दोपहर
लखनऊ की उस तपती दोपहर को जब एसी ने आखिरी हिचकी ली और कमरा धीरे धीरे भट्टी बनने लगा, मीरा के हाथ में फोन था और दिल में वही शरारत जो उन जीजा साली सेक्स कहानी हिंदी वाली किताबों में होती है जिन्हें वह रात को रजाई में छुपकर पढ़ती थी। पसीने की एक बूंद उसकी गर्दन से फिसलकर ब्लाउज के अंदर उतर गई, और उसने जीजाजी का नंबर मिला दिया।
बाहर लू चल रही थी और खिड़की का पर्दा भी गर्म हवा से हिल रहा था। मीरा ने पंखा फुल स्पीड पर किया, पर वह सिर्फ गर्म हवा फेंक रहा था। उसका दुपट्टा पीठ से चिपक गया था और कुर्ती भीगकर बदन से लिपट रही थी। उसने आईने में खुद को देखा और होंठों पर एक शरारती मुस्कान आ गई।
तीसरी घंटी पर विक्रम ने फोन उठाया। "हां बोलो, साली साहिबा।" मीरा ने आवाज में थोड़ी मासूमियत घोली। "जीजाजी, बचा लो। एसी मर गया है और मैं यहां पिघल रही हूं।" दूसरी तरफ एक पल की खामोशी, फिर उसकी हंसी। "पिघलने दो, थोड़ी पतली हो जाओगी।"
"बकवास बंद करो और जल्दी आओ।" मीरा ने कहा, और फिर धीरे से जोड़ा, "टूलबॉक्स लेकर आना, हीरो।" विक्रम की आवाज में शरारत उतर आई। "बीस मिनट में पहुंचता हूं। और हां, ठंडा नींबू पानी तैयार रखना।" फोन कट गया, पर मीरा की धड़कन नहीं थमी।
उसने जल्दी से हल्की सूती कुर्ती पहनी, वही जिसमें बदन साफ झलकता था, और बालों का जूड़ा खोल दिया। आईने के सामने खड़ी होकर उसने दो बार गहरी सांस ली। "यह सिर्फ एसी ठीक कराने की बात है," उसने खुद से कहा, पर आईने वाली लड़की की आंखों में कुछ और ही चमक रहा था।
बीस मिनट बाद डोरबेल बजी। विक्रम दरवाजे पर खड़ा था, टूलबॉक्स हाथ में, कुर्ता पीठ पर पसीने से भीगा हुआ। "कहां है मरीज?" उसने पूछा। मीरा ने अंदर का रास्ता दिखाया। "बेडरूम में। बहुत बीमार है।" विक्रम ने उसे एक नजर देखा, वह नजर जो जरूरत से एक पल ज्यादा ठहरी।
मीरा ने नींबू पानी का गिलास बढ़ाया। विक्रम ने एक ही सांस में आधा गिलास पी लिया, और उसकी नजर मीरा की भीगी गर्दन पर ठहर गई, जहां पसीने की बूंदें चमक रही थीं। मीरा ने वह नजर देखी, और नजरें हटाई नहीं। कमरे में एसी की घरघराहट के अलावा एक अजीब सी खामोशी छा गई।
विक्रम ने एसी का पैनल खोला और अंदर झांका। "टॉर्च पकड़ो," उसने कहा। मीरा उसके इतने करीब आकर खड़ी हुई कि उसकी सांस विक्रम की गर्दन पर पड़ रही थी। जब उनके हाथ टॉर्च पर टकराए, दोनों एक पल को ठिठक गए। वह छुअन बिजली जैसी थी, और दोनों ने उसे महसूस किया।
"जीजाजी," मीरा ने धीरे से कहा, "आप तो हर बिगड़ी हुई चीज ठीक कर देते हो।" विक्रम ने पैनल के अंदर देखते हुए जवाब दिया, "हर चीज नहीं, मीरा। कुछ चीजें मैं जानबूझकर बिगाड़ भी देता हूं।" मीरा की सांस अटक गई। उसने पूछा, "जैसे?" विक्रम मुड़ा और उसकी आंखों में देखा। "जैसे अभी।"
विक्रम वापस एसी की ओर मुड़ा, पर मीरा की नजर उसकी बाजुओं पर टिकी रही, जहां पसीने की बूंदें चमक रही थीं। वह रसोई से ठंडे पानी का गिलास लाई और खुद उसके होंठों से लगा दिया। जब उसने अपने दुपट्टे के पल्लू से उसका माथा पोंछा, विक्रम ने उसका हाथ पकड़ लिया और एक पल को छोड़ने का नाम नहीं लिया। "तुम्हें बुखार तो नहीं?" उसने पूछा, पर उसकी आवाज में फिक्र से ज्यादा कुछ और था।
फिर मीरा ने वह किया जो उसने सुबह से सोच रखा था। उसने अपना हाथ विक्रम के हाथ पर रख दिया, जो अभी भी टॉर्च पकड़े था। "आपके हाथ कितने गर्म हैं, जीजाजी," उसने फुसफुसाकर कहा। विक्रम ने हाथ नहीं हटाया। उसकी नजर मीरा के होंठों पर थी। "मीरा," उसने चेतावनी भरे लहजे में कहा, "तेरी दीदी..."
"दीदी मायके गई हैं।" मीरा ने उसकी बात काटी। "पूरे एक हफ्ते के लिए। इस घर में इस वक्त सिर्फ हम दोनों हैं, जीजाजी।" एक पल को कमरे में सिर्फ उनकी सांसों की आवाज रही। फिर विक्रम ने टॉर्च नीचे रखी, मीरा को कमर से पकड़कर अपनी ओर खींचा, और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
वह चुम्बन धीमा शुरू हुआ और फिर भूखा हो गया। विक्रम के हाथ मीरा की पीठ पर फिसल रहे थे, और मीरा ने उसके कुर्ते को मुट्ठियों में भींच रखा था। जब वे अलग हुए, दोनों हांफ रहे थे। "यह गलत है," विक्रम ने कहा, पर उसके हाथ अभी भी उसकी कमर पर थे। मीरा मुस्कराई। "तो हाथ हटाओ।" उसने हाथ नहीं हटाए।
वे बिस्तर पर गिरे, हंसते हुए, और मीरा विक्रम के ऊपर आ गई। उसने उसके होंठों पर उंगली रखी। "रुको," उसने कहा। "पहले एक शर्त। जो भी हो, यह सिर्फ आज की दोपहर है। कल से हम फिर वही जीजाजी और साली।" विक्रम ने उसकी उंगली को हल्के से काटा। "शर्त मंजूर। पर आज की दोपहर अभी बहुत लंबी है।" और उसने उसे पलटकर अपने नीचे कर लिया।
मीरा ने खुद अपनी कुर्ती के बटन खोलने शुरू किए, विक्रम की आंखों में देखते हुए, एक एक करके। कुर्ती फर्श पर गिरी। विक्रम की नजर उसके बदन पर ठहर गई, और उसने धीरे से उसके कंधों से ब्रा की स्ट्रैप सरकाई। "तुम बहुत खूबसूरत हो," उसने कहा, और मीरा ने उसके कुर्ते के बटन खोलने शुरू कर दिए।
बिस्तर पर वे एक दूसरे से लिपट गए। विक्रम ने मीरा के सीने को हाथों में भर लिया, दबाया, सहलाया, और फिर झुककर एक निप्पल को मुंह में ले लिया। मीरा की एक सिसकी निकली। उसका हाथ नीचे सरका और विक्रम के पजामे के अंदर पहुंच गया, जहां उसका लुंड पहले से तना हुआ था। "इतना बेसब्र?" वह हंसी। "तुम्हारे लिए," उसने कहा।
मीरा ने उसे बिस्तर पर लिटाया और खुद नीचे सरक गई। उसने उसका लुंड बाहर निकाला, एक पल उसे देखा, और फिर धीरे से अपने मुंह में ले लिया। विक्रम के मुंह से एक गहरी आह निकली। वह उसे चूसती रही, जीभ से सहलाती रही, ऊपर नीचे होती रही, जब तक विक्रम ने उसके बाल मुट्ठी में नहीं भींच लिए। "बस," वह हांफा, "अब नहीं।"
विक्रम ने उसे ऊपर खींचा और बिस्तर पर लिटा दिया। उसने उसकी सलवार उतारी, फिर पैंटी, और उसकी टांगें खोलकर उसके बीच झुक गया। जब उसकी जीभ मीरा की चूत पर लगी, मीरा की कमर बिस्तर से उठ गई। वह उसे चाटता रहा, चूसता रहा, उसकी सिसकियों को पीता रहा, जब तक मीरा का बदन कांपकर शांत नहीं हो गया और उसकी चूत से पानी नहीं बह निकला।
"अब," मीरा ने हांफते हुए कहा, "अब अंदर आओ।" विक्रम उसके ऊपर आया, और एक ही झटके में अपना लुंड उसकी गीली चूत में उतार दिया। मीरा ने जोर से उसके कंधे भींच लिए। वह उसे चोदने लगा, धीरे धीरे, गहरे झटकों के साथ, और मीरा हर झटके पर उसके नाम की सिसकी लेती रही।
फिर विक्रम अचानक रुक गया और बाहर निकल आया। मीरा ने विरोध में कराहा। "क्या हुआ?" "कुछ नहीं," उसने कहा, उसके ऊपर झुककर, "बस तुम्हें तड़पते देखना अच्छा लग रहा है।" उसने अपने लुंड को उसकी गीली चूत पर रगड़ा, अंदर जाए बिना, तब तक जब तक मीरा ने भीख नहीं मांगी। "प्लीज, जीजाजी, अंदर डालो न।" तब वह एक झटके में फिर अंदर घुस गया, और मीरा चीख पड़ी।
फिर उसने मीरा को पलटा और घुटनों के बल किया। पीछे से उसने उसकी कमर पकड़ी और एक बार फिर अंदर घुस गया, इस बार और गहरा। मीरा ने तकिया भींच लिया। उसके झटके तेज होते गए, बिस्तर दीवार से टकराने लगा, और मीरा चिल्लाई, "हां, ऐसे ही, रुको मत।" विक्रम ने उसकी पीठ पर झुककर उसके कंधे को हल्के से काटा।
वे दीवार के सहारे खड़े हुए, मीरा की एक टांग विक्रम के हाथ में, और वह उसे वहीं चोदता रहा। पसीना दोनों के बदन से बह रहा था, पर अब गर्मी का एहसास नहीं था, सिर्फ एक दूसरे की गर्मी थी। मीरा ने उसके होंठों को काटा और फुसफुसाई, "मैं झड़ने वाली हूं।" "साथ में," उसने कहा, और उसके झटके और तेज हो गए।
मीरा पहले झड़ी, एक लंबी सिसकी के साथ उसका बदन कांपा, उसकी चूत ने विक्रम के लुंड को भींच लिया। विक्रम ने दो और गहरे झटके मारे और फिर वह भी झड़ गया, अपना सारा पानी उसके अंदर छोड़ते हुए। दोनों वहीं ठहर गए, हांफते हुए, एक दूसरे से लिपटे हुए, जब तक उनकी सांसें सामान्य नहीं हुईं।
ठंडी हवा अब कमरे में घूम रही थी और मीरा की त्वचा पर रोंगटे खड़े हो गए। उसने चादर खींची और विक्रम की छाती पर उंगली से अनजान निशान बनाती रही। "दीदी को कभी पता नहीं चलेगा," उसने फुसफुसाया। विक्रम ने उसका हाथ पकड़कर चूम लिया। "पता चलेगा तो कह देंगे, एसी ठीक करने आया था।" दोनों हंस पड़े, और मीरा ने अपना सिर उसकी धड़कती छाती पर टिका दिया।
वे बिस्तर पर एक दूसरे से लिपटे लेटे रहे। विक्रम ने उसके माथे को चूमा। "यह बात यहीं रहेगी," उसने कहा। मीरा ने उसकी छाती पर सिर रखा। "कौन सी बात, जीजाजी? यहां तो सिर्फ एसी ठीक हुआ है।" वह हंसा और उसे और कसकर भींच लिया।
तभी एसी में एक घरघराहट हुई और ठंडी हवा का झोंका कमरे में फैल गया। दोनों हंस पड़े। "देखा," विक्रम ने कहा, "मैंने कहा था, हर बिगड़ी चीज ठीक कर देता हूं।" मीरा ने चादर खींचकर खुद को ढका और शरारत से मुस्कराई। "सिर्फ एसी ठीक हुआ है, जीजाजी।"
विक्रम ने अपने कपड़े उठाए और दरवाजे की ओर बढ़ा। जाते जाते वह रुका। "एसी ठीक हो गया," उसने कहा। मीरा बिस्तर पर लेटी मुस्करा रही थी। "अच्छा है," उसने कहा, "कल मैं इसे फिर से खराब कर दूंगी।"
उस रात दीदी का वीडियो कॉल आया। मीरा ने बिस्तर ठीक किया, चेहरा सामान्य रखा, और फोन उठा लिया। "कैसी हो?" दीदी ने पूछा। "बढ़िया," मीरा ने कहा, "बस गर्मी बहुत है।" तभी पीछे से एसी की ठंडी हवा का झोंका आया, और दीदी ने पूछा, "एसी चल रहा है न?" मीरा की धड़कन एक पल को रुक गई। "हां... जीजाजी ने ठीक कर दिया था।"
फोन रखते ही मीरा हंस पड़ी। उसने विक्रम को मैसेज किया, "दीदी को शक नहीं हुआ।" जवाब तुरंत आया, "अभी तो शुरुआत है, साली साहिबा।" मीरा ने फोन सीने से लगा लिया। बाहर लू अभी भी चल रही थी, पर उसके अंदर कुछ और ही चल रहा था।
अगली दोपहर ठीक तीन बजे मीरा ने एसी का प्लग निकाल दिया और फोन उठाया। विक्रम ने पहली घंटी में उठाया। "फिर खराब?" उसने हंसते हुए पूछा। "बहुत खराब," मीरा ने कहा। "आओगे?" दूसरी तरफ एक पल की खामोशी, फिर आवाज आई, "मैं रास्ते में हूं।"
इस बार विक्रम टूलबॉक्स लाया ही नहीं। दरवाजा खुलते ही उसने मीरा को दीवार से लगा दिया और बेतहाशा चूमने लगा। मीरा ने उसके कुर्ते के बटन खोले, उसने उसकी कुर्ती उतारी, और वे बेडरूम तक पहुंचते पहुंचते आधे नंगे हो चुके थे। "आज जल्दी नहीं," विक्रम ने कहा, "आज आराम से।"
उसने मीरा को बिस्तर पर लिटाया और उसके पूरे बदन को चूमा, गर्दन से लेकर पेट तक, हर इंच को सहलाते हुए। फिर वह नीचे सरका और उसकी चूत को मुंह में भर लिया, धीरे धीरे, तब तक जब तक मीरा की उंगलियां उसके बालों में उलझकर कांपने नहीं लगीं। फिर वह ऊपर आया, उसके अंदर उतरा, और उसे इतने प्यार से चोदा कि मीरा की आंखों में आंसू आ गए। वे साथ में झड़े, एक दूसरे का नाम लेते हुए।
बाद में वे बालकनी में खड़े ठंडी हवा खा रहे थे। विक्रम ने कहा, "अगर दीदी को पता चला..." मीरा ने उसकी बात काटी। "तो कह देंगे, एसी वाला आया था।" वह हंसा और उसे अपनी बांहों में भर लिया। "रोज खराब होगा यह एसी," उसने कहा। मीरा मुस्कराई। "रोज।"
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